हमें अपने सोचने का सहज तरीका बदलना है क्योंकि जो सहज है, उसमें तमाम गांठें व पूर्वाग्रह हैं। उनसे मुक्त होकर हमें हकीकत में जो हो रहा है, उसे जानना, देखना है। पहले यह देखें कि सचमुच क्या हुआ और उसका क्या असर हुआ। फिर यह समझें कि जो हुआ, वैसा क्यों हुआ। हमारे आसपास बहुत सारी अप्रत्याशित चीज़ें घटती रहती हैं। हमें उन्हें देख-समझकर अपनी समझ को अपडेट करते रहना पड़ेगा। अब परखें बुध की बुद्धि…औरऔर भी

हमें बाज़ार में भविष्यवक्ता के माइंडसेट से नहीं उतरना चाहिए। कल क्या होगा, इससे कमाई नहीं होती क्योंकि ऐसे जाननेवाले हज़ारों होते हैं। फिर, हमें कल के लिए सौदा तो आज ही करना है। इसलिए अभी जो बाज़ार में हो रहा है, हम उसे कायदे से समझ लें तो ट्रेडिंग से अच्छा कमा सकते हैं। यहां सचमुच कमानेवाले लोग पल-पल की चाल पर कमाते हैं। बाकी, कल की बात करनेवाले लफ्फाज़ी करते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अकेली एक ज़िंदगी और दिमाग का भरोसा नहीं कि कल क्या होगा। मगर लोगबाग उस शेयर बाज़ार के बारे में पूछते हैं कि अगले एक साल में कहां जानेवाला है जहां लाखों ज़िंदगियां और दिमाग लगे हैं। मजे लेनेवालों के लिए यह रवैया चलता है। लेकिन जो लोग ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं, उन्हें भविष्य का जानने का यह शगल छोड़ना पड़ेगा। अन्यथा, यह उहापोह उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसका देगी। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

नोटबंदी कितनी सफल होगी और प्रधानमंत्री मोदी 50 दिन बाद ‘सपनों का भारत’ दे पाएंगे या नहीं, इस पर अभी से कुछ कहना मुश्किल है। वैसे ‘सपनों का भारत’ इतना छोटा नहीं हो सकता कि इतने कम समय में हासिल हो जाए। लेकिन इतना साफ है कि आम जीवन से लेकर नोटों तक में भविष्य डिजिटल का ही होना है। आज तथास्तु में ऐसी सॉफ्टवेयर कंपनी जो अब डिजिटल जगत में अपना सिक्का जमाती जा रही है…औरऔर भी

जब हम बाज़ार के अंतर्निहित रिस्क को इतना समझ लेते हैं कि ड्राइविंग की सावधानियां की तरह वो हमारे अवचेतन में बैठ जाता है, तभी हम दरअसल ट्रेडिंग की रिंग में उतरने लायक बनते हैं। जाहिर है कि यह लायकी किनारे बैठकर नहीं आ सकती। लेकिन जब तक हम इस समझ तक नहीं पहुंचते, तब तक हमें ज्यादा ही सावधान रहना पड़ता है। नहीं तो सावधानी हटते ही दुर्घटना हो जाती है। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार किसी नियम का गुलाम नहीं। कब कौन-सी दिशा पकड़ लेगा, पक्का बता पाना असंभव है। वो किसी एक इंसान की मर्जी से नहीं, बल्कि लाखों या करोड़ों लोगों के मन व गणनाओं से चलता है। इनसे बनती है उसकी सामूहिक इच्छा जो रैंडम या यदृच्छया चलती है। ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने, अमेरिका में ट्रम्प की जीत और अपने यहां की नोटबंदी के लेकर कुछ ऐसा ही हुआ है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में उतरे हैं तो बार-बार खुद को चुटकी काटकर याद दिलाते रहना चाहिए कि हम धन के सबसे रिस्की ज़ोन में प्रवेश कर रहे हैं। घटनाएं बारम्बार हमें इस बात का अहसास कराती रहती हैं। लेकिन हम आसानी से उनके सबक भूल जाया करते हैं। किसको याद है कि 2009 में यूपीए सरकार की जीत के बाद भारतीय शेयर बाज़ार एक ही दिन में 17 प्रतिशत चढ़ गया था। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार समेत समूचे वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में कोई हारता है, तभी कोई जीतता है। कुछ लोगों का धन निकलकर दूसरों के पास जाता है। एक का नुकसान, दूसरे का फायदा होता है। हमें कोशिश यही करनी होती है कि हम हारने या गंवानेवाले खेमे में न रहे। लेकिन जब आकस्मिकताओं या बाज़ार के अपने स्वभाव के चलते भयंकर गिरावट का आलम हो, तब हमें क्या करना चाहिए? जबाव बेहद आसान है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

दो महीने पहले 7 सितंबर को 52 हफ्तों का शिखर छूनेवाला निफ्टी अब तक 7.5% गिर चुका है। संभव है कि दिसंबर में अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से यह और गिर जाए। लेकिन इसी दौरान मजबूत शेयर कुलाचें मार रहे हैं। हम आज तथास्तु में जो कंपनी उठा रहे हैं, उसका शेयर जून में 60 के आसपास था। अभी 300 रुपए के करीब है। बाज़ार में सतह के नीचे की इन अंतर्धाराओं को पकड़ना ज़रूरी है।औरऔर भी

आप सामान्य ट्रेडर हैं, आपके पास पांच लाख रुपए से कम पूंजी है तो शेयर बाज़ार में शॉर्ट सौदों से परहेज़ करें। सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि कुशल ट्रेडर बाज़ार में उठने या गिरने, दोनों ही सूरत में कमाता है। लेकिन गिरने पर कमाना बड़ी पूंजीवालों के लिए ही संभव है। एक तो ऐसे सौदे डेरिवेटिव सेगमेंट में ही संभव हैं। दूसरे इंट्रा-डे में की जानेवाली मार्जिन ट्रेडिंग बहुत रिस्की है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी