राजनेता अपनी ताकत चुनावों में जनता के वोट पाकर हासिल करते हैं। जनता के बम्पर वोट मिलने से ही उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है। लिस्टेड कंपनियां भी शेयर बाजार के ज़रिए निवेशकों से पूंजी, साख व ताकत हासिल करती हैं। साख व ताकत बढ़ने से उनके शेयर का मूल्य बढ़ता है। इससे कंपनी के साथ उसके शेयरधारकों को भी लाभ मिलता है और दोनों साथ-साथ जीतते चले जाते हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

राजनीति में वोट पाने के लिए डर और लालच की भावना का इस्तेमाल किया जाता है। शेयर बाज़ार में भी इन्हीं दो भावनाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इन भावनाओं का स्रोत है शरीर में पैक्रियाज़ के नीचे की एड्रेनल ग्रंथि, जिससे एड्रेनील हार्मोन निकलता है। यह हमारे अंदर ‘लड़ो या भागो’ की भावना भर देता है। सुरक्षा से जुड़े राष्ट्रवाद और शेयर बाज़ार में तेज़ी-मंदी के पीछे यही हार्मोन काम करता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

मतगणना जारी है। शाम होते-होते साफ हो जाएगा कि भावनाओं के उबाल और तिकड़मबाज़ी की जीत हुई है या देश के व्यापक अवाम ने अपने वास्तविक हितों को ध्यान में रखते हुए वोट दिया है। स्पष्ट हो जाएगा कि देश के अगले पांच साल का फैसला दिल से लिया गया है या बुद्धि से। बुद्धि से फैसला नहीं हुआ तो राजनीतिक गठबंधन की जीत के बावजूद देश हार जाएगा। यकीनन, यह दुभार्ग्यपूर्ण होगा। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सारा देश दिल थामकर 17वीं लोकसभा के चुनाव नतीजों का इंतज़ार कर रहा है। लेकिन थोड़ा ठहरकर सोचिए कि अगर पुलवामा व बालाकोट नहीं हुआ होता, तब भी क्या मोदी सरकार अपने काम के दम पर लोगों को इस तरह खींच पाती? यह है तो काल्पनिक सवाल, लेकिन प्रासंगिक इसलिए है क्योंकि भावनाओं के उबाल पर ली गई कोई प्रतिक्रिया जनमत का असली प्रतिनिधित्व नहीं करती। सवाल देश के पांच साल का है! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार विशुद्ध धंधा है। वहां बुद्धि की तलवार लेकर भावनाओं से खेलना स्वाभाविक है। मगर, राजनीति पहले धंधा नहीं, सेवा हुआ करती थी। उसे अब भी ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन आज का कड़वा सच है कि धर्म की तरह राजनीति भी सबसे कम समय में सबसे ज्यादा कमाने का धंधा बन गई है। इसमें सच नहीं, महज झांकी पेश की जाती है। विज्ञापनों के शोर में सच गायब हो जाता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जो भावनाओं में बहता है, वो हारता है और जो भावनाओं से खेलता है, वो जीतता है। राजनीति और शेयर बाज़ार, दोनों का सच यही है। राजनीति और शेयर बाज़ार में धंधा करनेवाले लोग भावनाओं को समझकर उनसे खेलते हैं। हम टीवी चैनलों पर जो एक्जिट पोल देखते हैं, वह भी धंधा है, उसी तरह जैसे एनालिस्ट बिजनेस चैनलों पर अपना ज्ञान बघारते हैं। सही निकल गया तो वाह-वाह। गलत निकला तो सन्नाटा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार से आप ज्यादा रिटर्न महज इसलिए नहीं कमाते कि आपने बहुत जटिल बिजनेस मॉडल वाली कंपनी में निवेश किया है। कंपनी ऐसी होनी चाहिए जिसका बिजनेस मॉडल आपको अच्छी तरह समझ में आ जाए। साथ ही उसके धंधे में एंट्री बैरियर इतना तगड़ा होना चाहिए कि दूसरा आसानी से घुस न पाए। वह एक-एक कदम भी बढ़ती रही तो काफी है, दस कदम की छलांग लगाने की ज़रूरत नहीं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के इतिहास की किताबें पढ़ने में बड़ा वक्त लगता है। इसलिए कुछ व्यावहारिक लोग शेयरों के भाव के लॉन्ग-टर्म चार्ट को ही देखकर अपनी समझ बनाते हैं। लेकिन एक बात गांठ बांध लें कि शेयर बाज़ार से धन कमाना ऊपर-ऊपर सैद्धांतिक रूप से जितना आसान लगता है, असल में वैसा कतई नहीं है। अपनी अधीरता व अवास्तविक उम्मीदों से हमें लड़ना होता है, गलत लोगों की सलाह से बचना पड़ता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में अभी जो चल रहा है, वह दरअसल क्या है? उथल-पुथल भरे माहौल में किन कदमों से बचना चाहिए? निवेश व ट्रेडिंग के सबसे अच्छे अवसरों को कैसे पकड़ा जाए? यह समझ व विद्या हासिल करने के लिए हमें दुनिया भर के शेयर बाज़ार के इतिहास को पढ़ना चाहिए। आप गूगल करेंगे तो इस पर कई अच्छी किताबें मिल जाएंगी। उसे अपने अनुभव से मिलाकर आप समग्र समझ बना सकते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…और भीऔर भी

क्या यह हमारे शेयर बाज़ार में लंबे करेक्शन या गिरावट का आगाज़ तो नहीं? या, यह अल्पकालिक डुबकी है जिसमें तमाम शेयरों पर चढ़ी चर्बी छंट जाएगी और वे निवेश या ट्रेडिंग के अच्छे स्तर पर आ जाएंगे? वैसे भी, हर हड़बड़ाहट के बाद सामान्य व शांत हो जाना बाज़ार का स्वभाव है। बाज़ार के इस स्वभाव को हमें संपूर्णता में समझना होगा। अन्यथा, तात्कालिकता में उलझकर हम अक्सर संतुलन खो देते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी