पैसे से पैसा कैसा बनाया जाए – इसकी तलाश दुनिया में हर किसी को रहती है। बिना यह जाने कि पैसे में जो खरीद-फरोख्त की शक्ति आती है, आखिर उसका स्रोत क्या है? भारत में पैसे से पैसा बनाने की यह दीवानगी करीब 1.07 करोड़ लोगों पर सवार है जो शेयर बाज़ार में सक्रिय ट्रेडिंग करते हैं, कैश सेगमेंट से लेकर डेरिवेटिव सेगमेंट तक में। डेरिवेटिव्स में भी ज्यादातर व्यक्तिगत ट्रेडर इंडेक्स ऑप्शंस और स्टॉक ऑप्शंस मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार को कितने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कारक किस हद तक प्रभावित कर रहे हैं, क्या इसे हम-आप तो छोडिए, कोई विशेषज्ञ भी सही-सही सटीक रूप से जान सकता है? आप कहेंगे कि भले ही विशेषज्ञ न जान सके, लेकिन आज लार्ज लैंग्वेज़ मॉडल (एलएलएम) पर काम कर रहे एआई टूल्स तो ज़रूर जानकर हमें बता सकते हैं। मगर, एआई टूल्स भी तो जो पहले से उपलब्ध है, उसे ही ताश के पत्तों की तरह शफल करकेऔरऔर भी

मध्यवर्ग खर्च चलाने के लिए बैंकों व एनबीएफसी से ऋण लिये जा रहा है। कॉरपोरेट क्षेत्र पूजी निवेश के बजाय कैश बचा रहा है और बैंकों से ऋण लेने से कतरा रहा है। लेकिन देश के उन 81.35 करोड़ गरीबों का क्या जो हर महीने सरकार से मिल रहे पांच किलो मुफ्त राशन पर निर्भर हैं? यह आश्चर्यजनक, किंतु सच है कि भारत के गरीब अमीरों की बनिस्बत ज्यादा धन सोने में लगाकर रखते हैं। सरकार केऔरऔर भी

रिजर्व बैंक का डेटा बताता है कि ‘हम भारत के लोगों’ की वित्तीय आस्तियां वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़कर ₹34.3 लाख करोड़ और देनदारियां ₹18.8 लाख करोड़ यानी, देनदारियां आस्तियों की 54.81% हो गईं। यह 1970-71 के बाद के 53 सालों का सर्वोच्च स्तर है। कोरोना से घिरे वर्ष 2021-22 तक में लोगों की देनदारियां आस्तियों की 34% थीं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोविड के बाद से ही लोगबाग बचा कम और उधारऔरऔर भी

सरकार कह सकती है कि वाह! जनता में कितनी खुशहाली है। लोगों के पास इतनी बचत है कि म्यूचुअल फंड एसआईपी में निवेश जून महीने में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। लगातार 15 महीनों से एसआईपी में आ रहा धन 20,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है। लेकिन झाग हटाकर सतह के नीचे देखें तो जनता का संत्रास भी दिख जाता है। जून महीने में 77.8% एसआईपी बीच में ही रोक दिए गए। इस दौरान 48.1 लाख एसआईपीऔरऔर भी

सरकार की तरफ से जारी आंकड़े भारतीय परिवारों की बड़ी ठंडी और बेजान तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन उससे परे जाकर देखें तो पता चलता है कि भारतीय परिवार वित्तीय सुरक्षा हासिल करने के लिए जबरदस्त हाथ-पैर मार रहे हैं। वित्तीय आस्तियों में लोगों के पास उपलब्ध कैश, बैंक डिपॉजिट और अन्य वित्तीय निवेश शामिल हैं, जबकि देनदारियों में बैंकों और अन्य स्रोतों से लिये गए ऋण शामिल हैं। वित्तीय आस्तियों से देनदारियां घटा दें तो भारतीयऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार की कमान भले ही कुछ दशकों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के हाथों में चली गई हो। लेकिन इसकी गति अंततः ‘हम भारत के लोग’ ही तय करेंगे, क्योंकि विदेशी निवेशकों का हाल तो यही है कि गंजेड़ी यार किसके, दम लगाकर खिसके। वे तो मुनाफा कमाकर खिसक लेंगे। इसलिए यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि फिलहाल हम भारतीयों की बैलेंस शीट या कहें तो वित्तीय आस्तियों और देनदारियों का क्या हिसाब चलऔरऔर भी

दुनिया एक बार फिर ट्रम्प द्वारा छेड़े गए टैरिफ युद्ध की दहशत में है। दक्षिण कोरिया व जापान पर 25%, ब्राज़ील पर 50%, मेक्सिको व यूरीपीय संघ पर 30% और यहां तक कि कनाडा पर 35% टैरिफ की धमकी। भारत-अमेरिका व्यापार संधि भी अनिश्चितता के घेरे में है। कुछ भी साफ नहीं। ट्रम्प ने भारत से कॉपर आयात पर 50% और दवाओं के आयात पर 200% तक टैरिफ लगाने की हुंकार भर रखी है। ऐसे में भलेऔरऔर भी

देश में जीडीपी के साथ और जीडीपी के नाम पर ऐसा खेल चल रहा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और बड़े-बड़े अर्थशास्त्री नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, जबकि अवाम बबूचक बना हुआ है। इस बीच अबूझ पहेली है कि जब सब कुछ इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है तो आम उपभोक्ता ही नहीं, कॉरपोरेट क्षेत्र तक में क्षमता इस्तेमाल का स्तर और लाभप्रदता अटकी क्यों है? यकीनन भारत इस समय दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। आईएमएफऔरऔर भी

गजब की विडम्बना है। एक तरफ भारत सरकार अपना 96% ऋण देश के आम लोगों की बचत या बैंक डिपॉजिट से हासिल कर रही है, वहीं दूसरी तरफ इन्हीं आम लोगों को घर-खर्च और खपत को पूरा करने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। रिजर्व बैंक की ताज़ा फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2025 तक भारतीय परिवारों ने जो ऋण ले रखा है, उसका 54.9% हिस्सा घर या जेवरात खरीदने के लिए नहीं, बल्किऔरऔर भी