भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात अपने-आप में ज्यादा नहीं कहा जा सकता। ब्रिक्स के मूल पांच देशों में रूस (24.8%) व दक्षिण अफ्रीका (79.5%) को छोड़ दें तो ब्राज़ील (95%) और चीन (102.3%) का ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे ज्यादा है। विकसित देशों में अमेरिका का यह अनुपात 128.7%, ब्रिटेन का 104.8%, फ्रांस का 119.6% और जापान का 226.8% है, जबकि जर्मनी का यह अनुपात 66% है। पाकिस्तान का तो ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे कम 71.3% है। असल दिक्कत यह हैऔरऔर भी

नए साल के बजट की बेला आ चुकी है। ऐसे में जानना ज़रूरी है कि ऊपर-ऊपर भले ही देश पहली तिमाही में जीडीपी 7.8%, दूसरी तिमाही में 8.2% और पूरे वित्त वर्ष में 7.4% की विकास दर के साथ उछलता दिख रहा हो, लेकिन सतह के नीचे तैरती और बढ़ती पस्ती गहराने लगी है। इसका सबसे बड़ा आभास देश में सरकारी ऋण और जीडीपी के बढ़ते अनुपात से मिलता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कहती रही हैंऔरऔर भी

इस समय दुनिया में भारत की स्थिति गांव में गरीब की लुगाई जैसी हो गई है जिसे हर कोई मजे में छेड़कर चला जाता है। ट्रम्प ने पहले 25% के ऊपर 25% और टैरिफ लगाकर अपनी शर्तें मनवा ली। अब 25% अतिरिक्त टैरिफ हट भी गया तो अमेरिका 25% तो लगाएगा ही। यूरोपीय संघ दूसरे तरीके से मजे ले रहा है। एक तरफ यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लायन कहती हैं कि यूरोपीय संघ भारतऔरऔर भी

आज के हालात में भारत में कमाना बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए भी मुश्किल हो गया है। दिसंबर तिमाही के ताज़ा वित्तीय नतीजे पस्ती की हालत का दस्तावेज़ बन गए हैं। जिन आईटी कंपनियों का दायरा विदेश तक फैला हुआ है, उन तक के नतीजे उम्मीद से खराब रहे हैं। इनमें टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो, टेक महिंद्रा और एलटीआई माइंडट्री शामिल हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और आईसीआईसीआई बैंक तक ने निराश किया है। रिलायंस रिटेल का धंधा दबनेऔरऔर भी

चीन पर बढ़ती निर्भरता सुनियोजित लगती है। नवंबर 2016 में नोटबंदी से हमारे एमएसएमई क्षेत्र की कमर तोड़ दी गई। जुलाई 2017 में जीएसटी आया तो छोटी व मध्यम औद्योगिक इकाइयों पर दूसरा सरकारी हमला हुआ। फिर मार्च 2020 में कोरोना महामारी में गलत लॉकडाउन के फैसले ने हज़ारों लघु इकाइयों पर ताला लगवा दिया। यह सब करते हुए सरकार मगन थी कि वह अर्थव्यवस्था का इनफॉर्मल स्वरूप खत्म कर उसे फॉर्मल बना रही है, सारी औद्योगिकऔरऔर भी

भारत को अगर अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस व जापान जैसा विकसित देश बनना है या चीन, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका व इंडोनेशिया जैसा उच्च मध्यम आय का देश भी बनना है तो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाना होगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 साल पहले 2015 में कहा था कि 2025 तक जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 25% पर पहुंचा देंगे। हकीकत यह है कि यह 2011-12 में जीडीपी का 17.4% हुआ करता था। 2024-25 में घटते-घटते 13.9% परऔरऔर भी

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। पिछले दस सालों में देश का जीडीपी मार्च 2016 के ₹135.76 लाख करोड़ से 2.63 गुना होकर मार्च 2026 तक ₹357.14 करोड़ पर पहुंचने जा रहा है। जाहिर है कि देश की धन-दौलत भी बढ़ी है। लेकिन यह धन-दौलत जा कहां रही है? किसानों की आय तो दोगुना हुई नहीं! इनकम टैक्स विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस सालों में मध्यम वर्ग की औसत कमाई ₹10.23 लाखऔरऔर भी

आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि भारत विपुल प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधनों के बावजूद चीन से ललकार कर बात नहीं कर पा रहा? असल में यह भारत की नहीं, देश की सत्ता पर बारह साल से कुंडली मारे बैठी मोदी सरकार की मजबूरी है। जिस तरह मोदी सरकार ट्रम्प को दो-टूक जवाब इसलिए नहीं दे पा रही क्योंकि न्यूयॉर्क की अदालत ने घूसखोसी के मामले में अडाणी की पूंछ दबा रखी है, उसी तरह अडाणी केऔरऔर भी

डोनाल्ड ट्रम्प ने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) का नाम लेकर टैरिफ-टैरिफ की चिल्ल-पों और अपने दूसरे कर्मों से अमेरिका को बर्बादी की ढलान पर डाल दिया है। वहीं, चीन अपनी मैन्यूफैक्चरिंग के दम पर विश्व विजय के अभियान पर निकल पड़ा है। उसने कनाडा से आयात होनेवाले कैनेला के बीजों पर टैरिफ 84% से घटाकर 15% करने के बदले वहां निर्यात की जानेवाली इलेक्ट्रिक कारों पर टैरिफ 100% से घटवा कर मात्र 6.1% करा लिया। चीनऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार का मूल्यांकन बहुत चढ़ा हुआ है। दुनिया में अमेरिका को छोड़ दें तो चीन व हांगकांग से लेकर यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया व ब्राज़ील तक के बाज़ार पी/ई अनुपात के पैमाने पर भारत से बहुत सस्ते हैं। क्या यह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के भारत से पलायन की प्रमुख वजह नहीं है? क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय शेयर और वहां ट्रेड हो रही तमाम अच्छी कंपनियों के शेयरों का मूल्यांकन बहुत ज्यादा है? यहऔरऔर भी