दो हफ्ते बाद 16 मार्च को पेश किए जानेवाले बजट में कई उत्पादों पर शुल्क की दरें बढ़ाई जा सकती हैं। साथ ही कर का दायरा भी बढ़ाया जा सकता है। बजट में इस तरह के तमाम उपाय होंगे ताकि रिजर्व बैंक आर्थिक विकास को गति देने के लिए बेझिझक ब्याज दरों में कमी कर सके। यह कहना है योजना आयोग के प्रधान सलाहकार प्रोनब सेन का। सेन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स के हुई बातचीत में यहऔरऔर भी

देश की आर्थिक विकास दर अक्टूबर से दिसंबर 2011 की तिमाही में घटकर 6.1 फीसदी पर आ गई है। यह पिछले करीब तीन सालों (11 तिमाहियों) में किसी भी तिमाही की सबसे कम आर्थिक विकास दर है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 की सितंबर तिमाही में जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर 6.9 फीसदी और उससे पहले जून तिमाही में 7.7 फीसदी रही थी। आर्थिक विकास दर में आई इस गिरावट की मुख्य वजह इस साल अबऔरऔर भी

सरकार ने मंगलवार को पहली बार मुद्रास्फीति के वो आंकड़े जारी किए जिनका वास्ता औद्योगिक खपत से नहीं, बल्कि आम उपभोक्ता के जीवन से है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर नए साल के पहले महीने जनवरी में मुद्रास्फीति 7.65 फीसदी रही है। जनवरी माह की ही थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति 6.55 फीसदी रही है। इस तरह उपभोक्ताओं के लिए मुद्रास्फीति की दर औद्योगिक खपत से 1.10 फीसदी ज्यादा है। खास बात यह है किऔरऔर भी

नए वित्त वर्ष 2012-13 का आम बजट शुक्रवार, 16 मार्च को पेश होगा। उसके एक दिन पहले 15 मार्च को दो चीजें बजट का माहौल व पृष्ठभूमि बनाएंगी। एक तो आर्थिक समीक्षा और दो, रिजर्व बैंक की मध्य-तिमाही मौद्रिक नीति समीक्षा। पूरी उम्मीद है कि उस दिन रिजर्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) को 5.50 फसीदी से आधा फीसदी घटाकर 5 फीसदी कर देगा। लेकिन सारा कुछ रिजर्व बैंक के गवर्नर दुव्वरि सुब्बाराव की सोच से तयऔरऔर भी

मुद्रास्फीति की दर जनवरी में उम्मीद से कुछ ज्यादा ही घटकर 6.55 फीसदी पर आ गई है। यह थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित सकल मुद्रास्फीति का नवंबर 2009 के बाद का सबसे निचला स्तर है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 में आर्थिक विकास दर के त्वरित अनुमान के घटकर 6.9 फीसदी रह जाने और मुद्रास्फीति के काफी हद तक काबू में आ जाने के बाद रिजर्व बैंक पर इस बार का दबाव बढ़ जाएगा कि वह ब्याज दरोंऔरऔर भी

अर्थशास्त्रियों को उम्मीद थी कि अक्टूबर में 4.7 फीसदी घटने के बाद नवंबर में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) जिस तरह 5.9 फीसदी बढ़ा था, उसे देखते हुए दिसंबर में आईआईपी की वृद्धि दर 3.4 फीसदी तो रहनी ही चाहिए। लेकिन सीएसओ (केंद्रीय सांख्यिकी संगठन) की तरफ से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार औद्योगिक उत्पादन में वास्वतिक वृद्धि मात्र 1.8 फीसदी की हुई है। साल भर पहले दिसंबर 2010 में यह वृद्धि दर 8.1 फीसदी रही थी।औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने साल 2010-11 में कागज के नोटों की छपाई पर कुल 2376 करोड़ रुपए खर्च किए। एक हज़ार का नोट छापने का कुल खर्च 3.17 रुपए आता है, जबकि पांच रुपए के नोट का खर्च 48 पैसे है। आनुपातिक रूप से पांच रुपए का नोट छापना सबसे महंगा है क्योंकि उसकी लागत अंकित मूल्य की 9.6 फीसदी है, जबकि यह अनुपात हज़ार रुपए के नोट के मामले में केवल 0.32 फीसदी है। देश में कागजऔरऔर भी

रिजर्व बैंक भले ही मानता हो कि चालू वित्त वर्ष 2011-12 में देश की आर्थिक विकास दर 7 फीसदी रहेगी, लेकिन वित्त मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु का कहना है कि यह 7 फीसदी से थोड़ी ज्यादा रहेगी। उन्होंने मंगलवार को यह आशा जताई। उनकी राय असल में पूरे वित्त मंत्रालय की राय है जिसका मानना है कि मार्च 2012 के अंत तक मुद्रास्फीति घटकर 6 से 7 फीसदी पर आ जाएगी। इस बीच सरकार नेऔरऔर भी

देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई (भारतीय स्टेट बैंक) का कहना है कि उसका काम केंद्र सरकार से मिलने वाले 7900 करोड़ रुपए से नहीं चलेगा, बल्कि उसे बढ़ती ऋण मांग को पूरा करने के लिए हर साल 15,000 करोड़ रुपए की दरकार है। बैंक के मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) दिवाकर गुप्ता ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत में कहा, “बैंक को संचित लाभ समेत कुल 15,000 करोड़ रुपए की जरूरत है। हमें निश्चित रूप से अगलेऔरऔर भी