शांत मन शांत
सृजन व संगीत की मधुर स्वर लहरियां शांत मन से ही निकलती हैं। झंझावात से बवंडर ही उठते हैं। चीख-चिल्लाहट के माहौल में सृजन नहीं हो सकता। इसे यह कहकर जायज नहीं ठहराया जा सकता कि विनाश सृजन की जमीन तैयार करता है।और भीऔर भी
सृजन व संगीत की मधुर स्वर लहरियां शांत मन से ही निकलती हैं। झंझावात से बवंडर ही उठते हैं। चीख-चिल्लाहट के माहौल में सृजन नहीं हो सकता। इसे यह कहकर जायज नहीं ठहराया जा सकता कि विनाश सृजन की जमीन तैयार करता है।और भीऔर भी
मन कहता है भगत सिंह हों। बुद्धि कहती है कि मेरे घर नहीं, दूसरे के घर। बोल वचन में हम किसी से कम नहीं। लेकिन कर्म की अपेक्षा दूसरों से करते हैं। दूसरे नहीं करते तो दोष उनका। यूं ही कड़ी से कड़ी चलती जाती है और होता कुछ नहीं।और भीऔर भी
तन से मुक्ति तो एक निश्चित विधान के हिसाब से अंततः हर किसी को मिल ही जाती है। लेकिन मरने से पहले तन से मुक्ति मन की मुक्ति के बिना नहीं मिलती। और, मन की मुक्ति के लिए सच्चा ज्ञान जरूरी है जो बड़ी मेहनत से मिलता है।और भीऔर भी
हमारा मन कहीं और भागता है तो विचारों के जरिए हम उसे पकड़ते हैं, संतुलित करते हैं। इन विचारों का निरपेक्ष सत्य होना कतई जरूरी नहीं। इनकी तात्कालिक भूमिका है मन के भटकाव को रोकना।और भीऔर भी
होलिका व प्रह्लाद तो बहाना हैं। मकसद है हर साल नियम से तन, मन, रिश्तों व धरती में जमा कंकास को जलाकर खाक करना, उल्लास मनाना। अभी तो कंकास इतना है कि हर तिमाही होली की जरूरत है।और भीऔर भी
यहां हर चीज का अपना स्वतंत्र चक्र है। तन का भी और उससे जुड़े मन का भी। खुद को दूसरे के हवाले करते ही चक्र उसकी शर्तों पर ढल जाता है। पर मुक्ति अपने चक्र के अपनी शर्तों पर चलने से मिलती है।और भीऔर भी
अपने को जानने का मतलब है अपने शरीर, मन और इस दुनिया-जहान की संरचना को जानना, इनकी मूल प्रकृति व अंतर्संबंधों को समझना। आज आंखें मूंदकर अपने को जानने की कसरत बेमतलब है।और भीऔर भी
ज्ञान तो विशाल सागर नहीं, अक्षय पात्र है। पुराना निकालो, नया बनता जाता है। कभी शेष नहीं होता। जब तक जीवन है, तब तक मन खदबद करता रहता है और ज्ञान का नया सत्व निकलता रहता है।और भीऔर भी
काहिल और कामचोरों का कभी कुछ नहीं हो सकता। बाकी हर किसी को अगर मन का काम मिल जाए और उससे उसका घर-परिवार भी चल जाए तो वह काम में ऐसा रमेगा कि कभी छुट्टी ही नहीं मांगेगा।और भीऔर भी
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