हमारे शेयर बाजार में पब्लिक या आम निवेशकों की भागीदारी लगातार घटती जा रही है। दूसरी तरफ विदेशी निवेशक लगातार इस स्थिति में बने हुए हैं कि उनके अकेले की ताकत पब्लिक समेत तमाम भारतीय निवेशकों के लगभग बराबर बैठती है। रेलिगेयर कैपिटल मार्केट्स की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कंपनियों की शेयरधारिता में आम निवेशकों का हिस्सा जून 2008 में 9.24 फीसदी था, लेकिन जून 2010 तक यह घटकर 8.16 फीसदी रह गया। इस दौरानऔरऔर भी

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने म्यूचुअल फंडों द्वारा विभिन्न स्कीमों में ली जानेवाली निवेश प्रबंधन और सलाह सेवाओं के लिए सीमा बांध दी है। साथ ही उसने स्कीम के खुले रहने से लेकर रिफंड व स्टेटमेंट तक भेजने का समय घटा दिया है। सेबी ने गुरुवार को एक अधिसूचना जारी कर म्यूचुअल फंडों के लिए संशोधित रेगलेशन जारी कर दिया। गजट में प्रकाशित होने के साथ 29 जुलाई 2010 से नए नियम लागू भी होऔरऔर भी

म्यूचुअल फंड के हर प्रचार के साथ लिखा या बोला जाता है कि म्यूचुअल फंड बाजार के जोखिम से प्रभावित होते हैं। कृपया निवेश करने से पहले ऑफर दस्तावेज को सावधानी से पढ़ लें। लेकिन अगर आप ऑफर दस्तावेज को पूरी सावधानी पढ़ें तो उसमें बाजार के जोखिम के बारे में एक लाइन भी नहीं रहती। खाली स्कीम का बखान ही बखान होता है। यह कहना है दो दशकों से भी ज्यादा वक्त से पूंजी बाजार केऔरऔर भी

दो साल पुराने वैश्विक वित्तीय संकट के बाद बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र के निवेश को सबसे ज्यादा जोखिम भरा माना जाने लगा है। लेकिन हमारे म्यूचुअल फंडों ने अपना सबसे ज्यादा निवेश इसी क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों में कर रखा है। पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी को एम्फी (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) के मिली जानकारी के मुताबिक मई अंत तक  म्यूचुअल फंडों ने अपनी कुल आस्तियों का 14.14 फीसदी हिस्सा बैंकों और 5.01 फीसदीऔरऔर भी

म्यूचुअल फंड की किसी भी स्कीम में कम से कम 20 निवेशकों का होना जरूरी है और एक यूनिटधारक के पास स्कीम या प्लान के कुल आकार का 25 फीसदी से ज्यादा हिस्सा नहीं हो सकता। इन शर्तों के उल्लंघन पर पूरी स्कीम ही बंद ही जा सकती है और यूनिटधारकों को उनका पैसा उस समय के एनएवी (शुद्ध आस्ति मूल्य) के हिसाब से लौटा देना होगा। लेकिन एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) पर सेबी का यह नियमऔरऔर भी

सुना है कि म्यूचुअल फंड उद्योग में डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल को नए सिरे से ढालने की बात चल रही है, लेकिन मुझे लगता है कि आज अहम जरूरत इस बात की है कि हम खुद से पूछें कि म्यूचुअल फंड उद्योग के बने रहने का ही क्या तुक है। हमें बराबर बताया जाता है कि म्यूचुअल फंड में प्रोफेशनल मैनेजर सबसे जुटाई गई बचत का कुशल प्रबंधन करते हैं और वे खुद अपना पैसा संभालनेवाले औसत निवेशक सेऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी 1 जुलाई 2010 से ऐसा नियम लागू करने जा रही थी, जिससे म्यूचुअल फंडों में कॉरपोरेट क्षेत्र का छोटी अवधि का भारी निवेश दूर भाग सकता था। लेकिन सेबी ने एक नया सर्कुलर जारी कर इस पर अमल की तारीख 1 अगस्त 2010 कर दी है। वैसे, साथ ही कहा कि जो म्यूचुअल फंड इसकी तैयारी कर चुके हों, वे इसे पहले भी लागू कर सकते हैं। असल में सेबी ने 2औरऔर भी

यह दास्तान है एचडीएफसी म्यूचुअल फंड को साल 2007 में 13 अप्रैल से 31 जुलाई के बीच लगाए करीब 2.38 करोड़ रुपए के फटके की। इसमें चार किरदार हैं। एचडीएफसी म्यूचुअल फंड की संचालक एसेट मैनेजमेंट कंपनी के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट – इक्विटीज निलेश कापडिया, उनके सहपाठी व ट्रेडर राजीव रमणीक लाल संघवी और संघवी से जुड़े दो अन्य ट्रेडर चद्रकांत पी मेहता और दीप्ति पारस मेहता। निलेश जून 2000 से अभी तक एचडीएफसी म्यूचुअल फंड कीऔरऔर भी

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) शेयरों की तरह म्यूचुअल फंड में निवेश के लिए भी डीमैट खातों को जरूरी बनाने पर विचार कर रहा है। सेबी मे इस बारे में बीते मई माह में म्यूचुअल फंडों के साझा मंच एम्फी (एसोसिशयन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) को एक पत्र भेजकर पूछा था कि क्यों न म्यूचुअल फंड निवेश को भी डीमैट एकाउंट से जोड़ दिया जाए। एम्फी को अपने सुझाव 15 जून, मंगलवार तक सेबी केऔरऔर भी

निवेशक खुद सीधे शेयर बाजार में पैसा लगाने की बजाय म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों से ज्यादा फायदा उठा सकते हैं। यह बात साबित होती है पिछले एक साल में ऐसी स्कीमों द्वारा दिए गए रिटर्न से। पिछले एक साल में बीएसई का मुख्य सूचकांक सेंसेक्स जहां करीब 70 फीसदी बढ़ा है, वहीं म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों का एनएवी (शुद्ध आस्ति मूल्य0 152 फीसदी तक बढ़ा है। म्यूचुअल फंड के आंकड़े और शोध से जुड़ी संस्थाऔरऔर भी