शब्दों का शोर है, घटाटोप है। अर्द्धसत्य का बोलबाला है। हर कोई अपने स्वार्थ के हिसाब से सत्य को परिभाषित करने में जुटा है। ऐसे में निरपेक्ष सत्य क्या है? बहुजन के हितों का पोषक सत्य क्या है? यह खुद बहुजन को ही खोजकर निकालना होगा।और भीऔर भी

जहां कुछ करने के लिए कुछ न करनेवालों की मंजूरी लेनी पड़े, जहां बिचौलियों की मौज और रिश्वत का बोलबोला हो, जहां कानून भी उन्हें ही बचाता हो, वैसे तंत्र का नाश आज नहीं तो कल अवश्यसंभावी है।और भीऔर भी

बुरे का बोलबाला तभी तक है जब तक अच्छे लोग उदासीन या चुप बैठे रहते हैं। दुनिया में नया ज्ञान, माल व मूल्य तो अच्छे लोग ही लाते हैं। बुरे लोग तो बस उसे इधर-उधर कर लूटते-लपेटते रहते हैं।और भीऔर भी