ये शरीर, हम और हमारा अवचेतन। अभिन्न हैं, फिर भी स्वतंत्र हैं। हम सोते हैं तो अवचेतन सुश्रुत वैद्य की तरह हमारी मरहम पट्टी में लग जाता है। शरीर तो मर्यादा पुरुषोत्त्म है। बस, हम ही बावले हैं।और भीऔर भी

यह अवचेतन में समाए अधूरेपन के बीच पूर्णता की तलाश है जो हम हमेशा नए से नया खोजते रहते हैं। हर नई चीज को देखकर पूछते हैं – इसमें नया क्या है? नए की यह निरंतर तलाश ही हमें ज़िंदा रखती है।और भीऔर भी