दिखेंगे किसी दिन श्री रेणुका के जलबे

श्री रेणुका शुगर्स में निवेश करने की सलाह सात-आठ महीने पहले शुरू हो गई थी। अक्टूबर से दिसंबर 2010 के बीच सभी ललकार कर कहते हैं कि इसे खरीद लो, इसमें अच्छा रिटर्न मिलेगा। लेकिन तब यह शेयर बहुत बेहतर स्थिति में था। नवंबर में 108.15 रुपए तक चला गया जो 52 हफ्ते का उसका उच्चतम स्तर है। जनवरी में उसका सर्वोच्च स्तर 101.50 रुपए रहा। लेकिन अजीब बात है कि जो शेयर अक्टूबर से दिसंबर-जनवरी तक ज्यादातर 90 रुपए से ऊपर रहा, वो 26 मई 2011 को गिरकर 56 रुपए की तलहटी तक जा पहुंचा। अब हर तरफ सन्नाटा है। कहीं से रेणुका को खरीदने की सलाह नहीं आ रही।

असल में बाजार और एनालिस्टों की यही रीत है। वे बहती गंगा में हाथ धोते हैं। बढ़ते हुए शेयर को खरीदने की सलाह देते हैं और गिर जाए तो फिर झांकते भी नहीं। यह आम निवेशकों की वही मानसिकता हुई कि बढ़ते हुए बाजार में खरीदो और गिरते हुए बाजार में बेचकर निकल लो। महंगा खरीदो, सस्ता बेचो की इस सोच से निवेशक हमेशा पिटते हैं। मुश्किल यह है कि बाजार से धंधा चलानेवाले लोग अपने फायदे के लिए निवेशकों की इसी आत्मघाती मानसिकता को हवा देते हैं। बिरले लोग ही हैं जो निःस्वार्थ भाव से वाजिब सलाह देते हैं। ऐसे ‘बाजारू’ माहौल में सिर्फ सतर्कता और खुद की रिसर्च व समझ ही हमारी मदद कर सकती है।

श्री रेणुका शुगर्स का शेयर शुक्रवार को बीएसई (कोड – 532670) में 64.60 रुपए और एनएसई (कोड – RENUKA) में 64.65 रुपए पर बंद हुआ है। यह 52 हफ्ते के न्यूनतम स्तर के करीब है। लेकिन इसके बावजूद अगर मुनाफे और मूल्यांकन को देखें तो बहुत-ही ज्यादा महंगा नजर आता है। कारण, मार्च 2011 की तिमाही में कंपनी की बिक्री साल भर पहले के 1557 करोड़ रुपए से 19.79 फीसदी घटकर 1248.90 करोड़ रुपए पर आ गई, जबकि शुद्ध लाभ में 85.09 फीसदी का धक्का लगा और वो 195.90 करोड़ रुपए से घटकर 29.20 करोड़ रुपए पर आ गया।

पिछली चार तिमाहियों को मिला दें तो कंपनी का शुद्ध लाभ 79.90 करोड़ रुपए निकलता है जो मार्च 2010 की इकलौती तिमाही के शुद्ध लाभ 195.90 करोड़ का आधा भी नहीं है। नतीजतन, कंपनी का टीटीएम (ठीक पिछले बारह महीनों) का ईपीएस (प्रति शेयर लाभ) 1.19 रुपए निकलता है और इस आधार पर उसका शेयर इतना गिरने के बावजूद 54.28 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। हालांकि एडेलवाइस जैसी ब्रोकिंग कंपनियां समेकित नतीजों के दम पर श्री रेणुका का टीटीएम ईपीएस 5.13 रुपए दिखाकर इसका पी/ई मात्र 12.7 ही बताती हैं। लेकिन आमतौर पर कंपनी को आंकने का सही पैमाना उसके स्टैंड-एलोन नतीजे ही होते हैं।

आपको पता ही होगा कि चीनी कंपनियों का वित्त वर्ष गन्ने की पेराई के हिसाब से अक्टूबर-सितंबर तक का होता है। इस लिहाज से जनवरी से मार्च की तिमाही उनकी दूसरी तिमाही या क्यू-2 होती है। नोट करने की बात यह है कि जब रेणुका शुगर्स की यह दुर्गति हो रही थी, उसी दौरान दूसरी चीनी कंपनियां शानदार धंधा कर रही थीं। मार्च में खत्म दूसरी तिमाही में चीनी कंपनियों का औसत शुद्ध लाभ 190 फीसदी बढ़ा है। अलग-अलग बात करें तो इस दौरान पैरी शुगर इंडस्ट्रीज का शुद्ध लाभ 178 फीसदी, बलरामपुर चीनी का 309 फीसदी, बजाज हिंदुस्तान का 129 फीसदी, आंध्रा शुगर्स का 60.35 फीसदी और त्रिवेणी इंजीनियरिंग का 58 फीसदी बढ़ा है।

उद्योग बढ़ रहा था, फिर भी श्री रेणुका शुगर्स को इतनी धमक क्यों और कैसे? इसकी सबसे प्रमुख वजह है कि कंपनी पर ऋण का बोझ बढ़ जाना। मार्च 2010 की तिमाही में उसने 16 करोड़ रुपए का ब्याज चुकाया था, जबकि मार्च 2011 की तिमाही में उसकी ब्याज अदायगी इससे लगभग चार गुनी 67.30 करोड़ रुपए रही है। कंपनी का मौजूदा ऋण-इक्विटी अनुपात 2.01 है। यानी, इक्विटी के दोगुने से ज्यादा उसके ऊपर कर्ज है। इतना सब कुछ जानकर भी क्या श्री रेणुका शुगर्स में मौजूदा स्तर पर निवेश करना चाहिए?

आप कहेंगे – नहीं। हम कहेंगे – हां। हमारा मानना है कि इस समय श्री रेणुका शुगर्स को पकड़ने का सही मौका है। 1998 में निज़ाम शुगर्स के अधिग्रहण से वजूद में आई यह देश की सबसे अच्छी चीनी कंपनी है। अच्छी इसलिए कि यह इस उद्योग की संपूर्व संभावना का इस्तेमाल कर रही है। यह चीनी के अलावा जहां इसकी उत्पादन प्रक्रिया से बेकार निकलनेवाली भाप से बिजली बनाती है, वहीं शीरे से खुद इथेनॉल भी बनाती है। वह चीनी के अंतरराष्ट्रीय बाजार को समझते हुए उसकी ट्रेडिंग भी करती है। कंपनी ब्राजील तक पहुंच चुकी है और इस समय चीनी उत्पादन में दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी कंपनी है। देश में उसकी सात चीनी मिलें हैं तो ब्राजील में चार। बाहर से लाई गई रॉ शुगर को बढ़िया चीनी में बदलने के लिए उसने देश के बंदरगाहों पर दो बड़ी शुगर रिफानरियां लगा रखी हैं। कंपनी पिछले पांच सालों से लगातार लाभांश देती रही है।

लेकिन इन सारी बातों से भी ज्यादा बडा व मजबूत पक्ष है कि श्री रेणुका शुगर का प्रबंधन, उसके संचालक। इसे चलानेवाली मां-बेटे की जोड़ी जबरस्त है। कंपनी के प्रबंध निदेशक नरेंद्र मुरकुम्बी इंजीनियर हैं और उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए किया है। साल 2010 में इकनॉमिक टाइम्स ने उन्हें ‘वर्ष का उद्यमी’ पुरस्कार से नवाजा था। उनकी मां और कंपनी की सह-संस्थापक विद्या मुरकुम्बी का भी कोई तोड़ नहीं है।

हम मां-बेटे की इस जोड़ी और इनकी उद्यमशीलता पर आंख मूंदकर दांव लगा सकते हैं। अभी ऋण या अन्य जो भी दबाव हैं, वे कंपनी की भावी विस्तार योजनाओं के चलते हैं। कंपनी ने जिस तरह चीनी उद्योग के हर पहलू को पकड़ा है, उसके राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय आयाम को साधा है, उसमें दस साल बाद यह जबरदस्त कंपनी होगी, हमारा ऐसा यकीन है। इसका शेयर अभी कुछ अनुपातों व आंकड़ों के आधार पर भले ही महंगा लगे। लेकिन लंबे दांव के लिए अभी का भाव यकीनन सस्ता है।

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