सूप नहीं, चलनी ये रेटिंग एजेंसियां

स्टैंडर्ड एंड पुअर्स, मूडीज और फिच जैसी रेटिंग एजेंसियों ने दुनिया भर में देशों से लेकर बैंकों तक को डाउनग्रेड करने का सिलसिला जारी रखा है तो हर तरफ निराशा ही निराश फैली गई है। इससे इन एजेंसियों को चाहे कुछ मिले या नहीं, लेकिन समूची दुनिया में निवेशकों को वित्तीय नुकसान जरूर हो रहा है। ध्यान दें कि ये वही रेटिंग एजेंसियां हैं जिन्हें 2007-08 में अमेरिका के सब-प्राइम संकट का भान तक नहीं हुआ था और उस संकट में डूबे तमाम बैंकों को इन्होंने अपनी श्रेष्ठतम रेटिंग दे रखी थी।

खैर, पिछले तीन सालों में इनकी काबिलियत और सतर्कता बढ़ गई हो तो बड़ी अच्छी बात है। लेकिन हकीकत में हमें तो यही लगता है कि अब समय आ गया है कि इन एजेंसियों को ही डाउनग्रेड कर दिया जाए क्योंकि इनके फैसले न केवल मनमाने और पूर्वाग्रह से भरे हैं, बल्कि समय के साथ इनका तालमेल एकदम बिगड़ा हुआ है। इसके विशद व समृद्ध अनुभव से हमें यह समझ में आता है कि जो काम ये एजेंसियां अभी कर रही हैं, वे चाहतीं तो साल भर पहले यूरोप संकट की शुरूआत के समय ही कर सकती थीं। लेकिन इन्होंने नहीं किया।

आखिर उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुंचने में इतने महीने क्यों और कैसे लग गए कि इनका डाउनग्रेड करना जरूरी है। जैसे, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का एनपीए (फंसे हुए ऋण) अचानक सितंबर में तो 3 फीसदी तक नहीं पहुंचा है। एसबीआई ने मार्च 2011 की तिमाही में एनपीए के लिए 2000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। इसलिए इसे डाउनग्रेड करना था तो अप्रैल 2011 में कर देना चाहिए था, न कि अक्टूबर 2011 में। मूडीज का कहना है कि एसबीआई का एनपीए कुल आस्तियों या ऋणों का 12 फीसदी हो जाएगा। लगता है, मूडीज किसी और दुनिया में रहती है। यह बात वैश्विक बैकों व दूसरे देशों के लिए सच हो सकती है, भारत के लिए नहीं। फिर भी अगर भारत सरकार व रिजर्व बैंक वाकई इतने ही ढीले हैं तो एसबीआई से शेयर की औकात तो 500 रुपए भी नहीं है!!!

इस बार हमारी सोच और सलाह बड़ी सीधी-साधी है। इस समय निराशावाद की अति ने अंदर ही अंदर तेजी के नए दौर का माहौल बना दिया है और यह अब बस शुरू ही होनेवाला है। बुनियाद पड़ गई है और इस समय इसे जमाने का सिलसिला चल रहा है। पहले निफ्टी में 5500 पर नए टेक-ऑफ की तैयारी हुई थी। अब वही काम थोड़ा नीचे 4700 अंक पर हो रहा है।

भारतीय शेयर बाजार जिस तरह एफआईआई की सारी बिकवाली को पचा जा रहा है और एक निश्चित स्तर से नीचे नहीं जा रहा, उससे यही आभास होता है कि यह एकदम धरातल तक पहुंच चुका है। अब गिरने की और गुंजाइश नहीं बची। निश्चित रूप से अगले दो महीने उथल-पुथल से भरे रहेंगे। लेकिन दिशा ऊपर की रहेगी। फिर एक दिन बाजार उड़ान भरना शुरू कर देगा और बड़ी अदा से निफ्टी के 200 डीएमए (200 दिनों का मूविंग औसत) को पार कर जाएगा। निफ्टी में अभी का 200 डीएमए 5474.22 है।

लेकिन याद रखें कि इस दौरान मंदड़िए तब तक हमला जारी रखेंगे, जब तक वे एक खास स्तर पर फंस नहीं जाते और उन्हें अहसास नहीं हो जाता है कि अब बाजार को और ज्यादा तोड़ना उनके बूते का रोग नहीं है। बाजार से यूं तो तेजड़िए गायब हो चुके हैं, फिर भी कुछ लोग हैं जो साफ-साफ सारी स्थिति को बयां कर रहे हैं और अपनी पोजिशन सुरक्षित रखे हुए हैं। यह तेजी के अगले दौर का आगाज है। जो साल 2011 के राहुकाल को शांति से पार कर जाएंगे, वे 2012 से लेकर 2016 तक अबाधित तेजी व समृद्धि का फल चखेंगे। मुमकिन है कि वो भारतीय बाजार में अब तक की तेजी का सबसे बड़ा दौर हो। वैसे भी अब आपके पास खोने को कुछ नहीं बचा। अब तो पाना ही पाना है, गंवाना कुछ नहीं।

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