चीन ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश भारत के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में निवेश करने को तैयार नहीं है। इसके बाहरी और आंतरिक दोनों ही कारण है। सरकार को लगता है कि टैक्स में रियायत देकर विदेशी निवेश खींचा जा सकता है। लेकिन ईडी और सीबीआई के जरिए जिस तरह कंपनियों को परेशान करके वसूली की जाती है, वो सारी दुनिया को पता लग चुका है तो कोई भी कंपनी लफड़े में नहीं पड़ना चाहती। हां, चीन की तरह सबको भारत का विशाल बाज़ार ज़रूर चाहिए। अरबों डॉलर की डिफेंस डील चाहिए। इसके लिए वे कमाचलाऊ न्यूनतम निवेश ही करेंगे। फैक्ट्रियों में काम की स्थितियों के आंतरिक पहलुओं की बात करें तो भारत का कॉरपोरेट क्षेत्र कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य की विकट समस्या से जूझ रहा है। जनवरी से नवंबर 2024 के बीच किए गए एक व्यापक सर्वे के मुताबिक देश के कारपोरेट क्षेत्र में काम कर रहे 25 साल से कम उम्र के 90% से ज्यादा कर्मचारी दुश्चिंता और व्यग्रता से जूझ रहे हैं। यहां तक कि जीवन में थोड़ा सेटल हो चुके 45 साल से ऊपर के 67% कर्मचारियों में भी ऐसी व्यग्रता पाई गई। समस्या इतनी गंभीर है कि कंपनियों को अलग से काउंसेलिंग की व्यवस्था करनी पड़ रही है। सर्वे में 83,000 से अधिक काउंसेलिंग सत्रों के विश्लेषण से पता चला कि 59% कर्मचारियों में आत्मघात या खुदकुशी का प्रबल रुझान है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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