जरा-सा जोर और, फिर सरपट दौड़

बाजार के 5185 अंक तक नीचे चले जाने के बाद हम तीसरी बार 5600 का स्तर छूने की राह पर हैं। बस, 75 अंक का फासला और बचा है। पहली दो बार हालात थोड़ा परेशान करनेवाले और नकारात्मक थे। लेकिन इस बार कच्चे तेल के अलावा ऐसा कोई बड़ा कारक नहीं दिख रहा। बल्कि बजट का पारित होना, कॉरपोरेट नतीजों का दौर, विश्व अर्थव्यवस्था की बेहतर स्थिति, एफआईआई की तरफ से हो रहे अपग्रेड़, वित्त वर्ष के अंत का रीतापन और बाजार में निवेश के पैटर्न जैसे सकारात्मक कारक बाजार को आगे ले जाने का ठोस आधार बना रहे हैं।

ये सारे पहलू भी अगर निवेशकों को नहीं आश्वस्त कर पाए तब तो गलत मौके पर खरीद और गलत मौके पर बेचने के लिए निवेशकों को ही दोषी ठहराया जाना चाहिए। इसलिए सेबी की चेतावनी उन ब्रोकरों के साथ-साथ निवेशकों के लिए भी सटीक और भली है जो बिना किसी पुष्टि के निहित स्वार्थों को साधने के लिए भेजे गए फर्जी एसएमएस पर आंख मूंदकर यकीन कर लेते हैं। ऐसे एसएमएस और निराधार ‘खबरों’ को फैलने से रोका ही जाना चाहिए।

यह हफ्ता कमोबेश बीत चुका है। अब क्या, कल ही का दिन तो बचा है। अगले हफ्ते में नए सेटलमेंट में जाने के लिए केवल दो दिन बचे हैं। तब नई फंडिंग बाजार में आएगी। मेरी कुछ बाहर के फंड मैनेजरों से बात हो रही थी और उन सभी की धारणा भारत की विकासगाथा को लेकर काफी तेजी की या बुलिश है। उनका तर्क है कि इस बार 2008 के विपरीत एफआईआई ने पहली बार स्तरीय स्टॉक्स में निवेश कर रखा है। इसलिए इस बार बाजार में बहुत तेज सुधार होगा।

मेरा मानना है कि अचानक कुछ बड़ी घटना नहीं हो गई तो निफ्टी बहुत जल्द ही 5700 का स्तर पकड़ने जा रहा है। इस बार जब यह 5600 का स्तर, जो 200 दिनों का मूविंग औसत (डीएमए) भी है, बड़ी आसानी से पार कर जाएगा क्योंकि यह अपने को अब पूरी तरह जमा चुका है। टेक्निकल विशेषज्ञों के अनुसार उन्होंने अप्रैल 2011 के लिए बड़े पैमाने पर 5300 के पुट ऑप्शन के साथ-साथ 5800 के कॉल ऑप्शन भी खरीद रखे हैं। पुट ऑप्शन में बेचने का विकल्प होता है जबकि कॉल ऑप्शन में खरीदने का।

आप उनकी इस उहापोह से खुद अपना निष्कर्ष निकाल सकते हैं क्योंकि किंतु-परंतु की भाषा मुझे समझ में नहीं आती। अगर मैं तेजी की धारणा रखता हूं तो मैं जोखिम उठाऊंगा और लांग पोजिशन बना लूंगा। मंदी की धारणा है तो इसका उल्टा करूंगा। बहुत संभल-संभल कर चलने से कुछ नहीं मिलता। हां, इससे ब्रोकरों से ब्रोकरों को चार गुना कमाई जरूर हो जाती है।

झूठ और बिल्ली में सबसे बड़ा फर्क यह है कि बिल्ली तो नौ सौ चूहे खाकर भी हज को जा सकती है। लेकिन झूठ की हांडी सिर्फ एक बार चढ़ती है।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ है। लेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं उलझना चाहता। सलाह देना उसका काम है। लेकिन निवेश का निर्णय पूरी तरह आपका होगा और चक्री या अर्थकाम किसी भी सूरत में इसके लिए जिम्मेदार नहीं होगा। यह कॉलम मूलत: सीएनआई रिसर्च से लिया जा रहा है)

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