सिम्प्लेक्स इंफ्रा के सबक हैं काम के

सभी आवश्यक सूचनाओं तक सबकी पहुंच। किसी भी बाजार के कुशलता से काम करने की यह अनिवार्य शर्त है। ध्यान दें, सूचनाओं की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं, उनकी पहुंच जरूरी है। जो फेंच न जानता हो, उसे फ्रेंच में जानकारी देना महज एक अनुष्ठान भर पूरा करना है। लेकिन अपने यहां, खासतौर पर शेयर बाजार में यही हो रहा है। एक तो सारी सूचनाएं अंग्रेजी में, दूसरे ऐसा घालमेल कि आम निवेशकों को कुछ पल्ले ही न पड़ता। सब सिर के ऊपर से गुजर जाता है।

जैसे, कोलकाता की कंपनी सिम्प्लेक्स इंफ्रास्ट्रक्चर ने दो हफ्ते पहले 14 नवंबर को सितंबर तिमाही के नतीजे घोषित किए तो बताया कि इस दौरान डॉलर-रुपए की विनियम दरों में आए उतार-चढ़ाव के चलते उसे विदेशी मुद्रा में लिए गए ऋणों पर 13.92 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। लेकिन इनका प्रावधान नहीं किया गया क्योंकि कंपनी ने इसकी हेजिंग कर रखी है और इनका स्वरूप वास्तविक नहीं, बल्कि नोशनल यानी मान लेने भर का है। वहीं, कंपनी के स्वतंत्र ऑडिटर अपने लिमिटेड रिव्यू में कहते हैं कि एकाउंटिंग मानक-11 के तहत इस नुकसान का प्रावधान जरूरी था और ऐसा किया जाता तो सितंबर तिमाही में कंपनी का शुद्ध लाभ 17.87 करोड़ रुपए की जगह 3.95 करोड़ रुपए ही होता। यानी, सिंतबर 2010 की तिमाही के शुद्ध लाभ 26.87 करोड़ रुपए से 85.29 फीसदी कम।

आम निवेशक किसको सही मानें? ऊपर से आईसीआईसीआई सिक्यूरिटीज जैसी प्रतिष्ठित ब्रोकरेज फर्म उन्हें और ज्यादा दिगभ्रमित कर देती है। उसने इन नतीजों के आने के दो दिन बाद 16 नवंबर को अपनी सिफारिशी रिपोर्ट जारी। इसमें यह तो बताया गया कि चालू वित्त वर्ष 2011-12 की दूसरी तिमाही में सिम्प्लेक्स इंफ्रा का धंधा 25.7 फीसदी की जबरदस्त वृद्धि के साथ 1322 करोड़ रुपए हो गया है। विदेशी मुद्रा की दरों में आए उतार-चढ़ाव से पड़े दबाव की भी बात की। लेकिन असली नुकसान की बात दबा दी गई।

उसने यह भी नहीं बताया कि राजनीतिक बवंबर में फंसे देश लीबिया में स्थित कंपनी की इकाई सिम्प्लेक्स लीबिया की देनदारियों का क्या असर पड़ेगा। घुमा-फिराकर बस इतना कह दिया कि सिम्प्लेक्स इंफ्रा को खरीद लें और यह 24 महीनें में 36 फीसदी बढ़कर 285 रुपए हो जाएगा। रिपोर्ट लिखे जाते वक्त यह शेयर 210 रुपए पर था। अभी शुक्रवार, 25 नवंबर को इसका दो रुपए अंकित मूल्य का शेयर बीएसई (कोड – 523838) में 188.30 रुपए और एनएसई (कोड – SIMPLEXINF) में 188.80 रुपए पर बंद हुआ है। कहां 36 फीसदी बढ़ने का सब्जबाग और कहां सात कारोबारी सत्रों में 10.5 फीसदी की गिरावट।

ध्यान दें कि आम निवेशक भले ही आईसीआईसीआई सिक्यूरिटीज की सिफारिश के झांसे में आ गए हों, लेकिन बाजार के प्रमुख खिलाड़ियों को सिम्प्लेक्स इंफ्रा की ताजा हालत पता थी तो उन्होंने इसे जमकर निकाला और शेयर गिर गया। सवाल उठता है कि आम निवेशकों को स्टॉक एक्सचेंज जैसे सार्वजनिक मंच पर लिस्टेड कंपनियों के बारे में वही सूचनाएं सही रूप में कैसे मिल जाएं जो खास लोगों को उपलब्ध हैं क्योंकि इनके बिना तो बाजार सही ढंग से चल नहीं सकता? हमारे कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय और पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी के आला अधिकारी पारदर्शिता और सूचनाओं की सर्व-सुलभता की बात तो करते हैं। लेकिन वे व्यवहार में वे भी निहित स्वार्थों के हाथ की कठपुतली बने नजर आते हैं।

यह सच है कि सितंबर 2011 की तिमाही में विदेशी मुद्रा दरों के उतार-चढ़ाव के चलते भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र को 8000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ है। पिछले तीन महीनों में रुपया 22 फीसदी से ज्यादा गिर चुका है और शेयरों के भाव 30 से 50 फीसदी तक गिर चुके हैं। विदेशी निवेशकों तक की पूंजी 50 फीसदी स्वाहा हो चुकी है। ऐसे में ब्रोकरेज फर्मों को सच को छिपाने के बजाय हकीकत को सामने लाने का काम करना चाहिए। लेकिन वे एक तरफ आम निवेशकों को खरीदने को कहती हैं, दूसरी तरफ खास निवेशक बेचने पर उतारू रहते हैं। ऐसे में भरोसा करें तो किस पर?

सिम्प्लेक्स इंफ्रा के बारे में ज्यादा कुछ न कहकर बस इतनी सलाह है कि जो कंपनी असली बात को सही परिप्रेक्ष्य में न पेशकर धुंधली तस्वीर पेश करती है, उससे दूर रहना ही भला है। लेकिन ऐसे वाकयों से सबक सीखने का सिलसिला जारी रखना चाहिए। तभी किसी दिन आम भारतीय निवेशक की स्थिति ऐसी हो पाएगी कि कोई भी दल्ला उसे चरका नहीं पढ़ा पाएगा।

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