अच्छे बजट की जमीन तैयार, बाजार में होगी तेजड़ियों-मंदड़ियों में मार

आर्थिक समीक्षा ने अच्छे बजट की जमीन तैयार कर दी है। वित्त वर्ष 2011-12 में 9 फीसदी आर्थिक विकास की दर। कृषि और इंफ्रास्ट्रक्टर पर जोर। चालू खाते के घाटे को कम करने की चिंता जो वित्त मंत्री को विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को खुश रखने को मजबूर किए रहेगी। मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत। बीमा व बैंकिंग क्षेत्र के सुधार। काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कदम। ऊपर से हल्के से आसार इस बात के कि डेरिवेटिव सौदों पर एसटीटी (सिक्यूरिटीज टांजैक्शन टैक्स) हटाया जा सकता है। इतनी बातें शेयर बाजार को शायद खुश करने के लिए काफी हैं। लेकिन यह भी तय मानिए कि मंदड़िये बाजार को गिराने का कोई न कोई बहाने ढूंढने की हरचंद कोशिश करेंगे।

बस एक चिंता है मुद्रास्फीति पर काबू पाने की। तो, इसमें खास बढ़त हुई है खाद्य मुद्रास्फीति में। इसलिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी कृषि उत्पादन बढ़ाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) में अनाज की बरबादी रोकने के उपाय कर सकते हैं। इस साल 2010-11 में कृषि क्षेत्र की विकास दर 5.4 फीसदी रहने का अनुमान है। इसे नए वित्त वर्ष 2011-12 में 6 फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा जा सकता है।

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने शुक्रवार को संसद में पेश वित्त वर्ष 2010-11 की आर्थिक समीक्षा में कहा था कि वैश्विक घटनाक्रमों मसलन जिंस बाजार में उतार-चढ़ाव, पश्चिम एशिया में राजनीतिक अस्थिरता जैसे कारणों के बावजूद 2011-12 में आर्थिक वृद्धि दर 9 फीसदी रहने की संभावना है।

आर्थिक समीक्षा में माना गया है कि ऊंची मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई है। इसलिए इस बारे में वित्त मंत्री नए बजट में जरूर कोई न कोई कदम उठाएंगे। हालांकि वित्त मंत्री याद दिला चुके हैं कि साल भर पहले फरवरी 2010 में भी खाद्य मुद्रास्फीति 20.2 फीसदी थी, जबकि इस साल फरवरी मध्य तक यह 11.49 फीसदी पर है। जनवरी 2011 में सकल मुद्रास्फीति की दर 8.23 फीसदी रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक कह चुके हैं कि मार्च 2011 के अंत तक कुल मुद्रास्फीति 7 फीसदी पर आ जाएगी।

आर्थिक समीक्षा में वित्तीय एकीकरण पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है, ‘‘खाद्य मुद्रास्फीति, जिंसों के ऊंचे दाम और वैश्विक जिंस बाजार में उतार-चढ़ाव चिंता का विषय हैं और इसके चलते वित्तीय एकीकरण और भंडार की स्थिति को मजबूत करने की आवश्यकता है।”

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