आंखें धोखा खा सकती हैं, सूत्र नहीं

शेयर बाजार से नोट कमाना तालाब से मछली पकड़ने जैसा काम नहीं है कि बंशी डालकर बैठ गए और फिर किसी मछली के फंसने का इंतज़ार करने लगे। शेयर बाजार में किस्मत का खेला भी कतई नहीं चलता। यहां से तो कमाने के लिए पौधे लगाकर फल-फूल पाने का धैर्य चाहिए। घात लगाकर सही मौके को पकड़ने की शेरनी जैसी फुर्ती चाहिए। और, सही मौके की शिनाख्त के जरूरी है सही जानकारी। फिर सही जानकारी से सार निकालने के सही सूत्र। ये सारे सूत्र आज से नहीं, सालों-साल से सुपरिभाषित हैं।

दिक्कत यह है कि ज्यादातर लोग इन सूत्रों को जाने बिना ही निवेश से कमाई करने की जुगत में लगे रहते हैं। इसलिए धोखा खा जाते हैं। जैसे, एक सूत्र कंपनी द्वारा लगाई गई पूंजी पर हासिल किए गए रिटर्न (ROCE या रिटर्न ऑन कैपिटल इम्प्लॉयड) का है। कुछ लोग इसे रिटर्न ऑफ कैपिटल इनवेस्टेड (ROCI) भी कहते हैं। यह आंकड़ा सहज उपलब्ध है। एडेलवाइस जैसी तमाम ब्रोकरेज फर्में या हमारी सहयोगी कंपनी सीएनआई रिसर्च इसे मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं।

आरओईसी से पता चलता है कि कंपनी का प्रबंधन भावी विकास के लिए अच्छा निवेश करने में कितना निपुण है। यह अनुपात अगर 25 फीसदी से ऊपर है तो समझिए कंपनी दुरुस्त है। कंपनी अगर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बढ़ व बन रहे क्षेत्र में है तो 15 फीसदी से ऊपर का अनुपात भी अच्छा माना जाता है। लेकिन किसी भी सूरत में 15 फीसदी से नीचे के ROCE वाली कंपनी में भूलकर भी निवेश नहीं करना चाहिए। हम हफ्ते-दर-हफ्ते इसी कोशिश में लगे हैं कि व्यापक हिंदी अवाम तक निवेश के ऐसे तमाम सूत्र सहज भाषा व अंदाज में पहुंचा दें। आइए देखते हैं कि बीते कुछ दिनों में हमने क्या जाना-समझा…

  • पानी अपने बहने का रास्ता खुद ढूंढ लेता है। लेकिन उसके संचय के लिए सायास टंकी या तालाब बनवाना पड़ता है। उसी तरह पैसा बहाने के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन उसके संचय व सही नियोजन के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। रातोंरात धन बनता नहीं, उड़ता है। इसलिए कभी भी खटाखट नोट बनाने के चक्कर में न पड़ें। धैर्य रखें। शेयर बाजार में बराबर ट्रेड हो रही करीब 3000 कंपनियों में से कम से कम 500 ऐसी हैं जिनसे आपकी बचत का टांका भिड़ाया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे कि जिस तरह ज़िंदगी में इकतरफा इश्क नहीं चलता। उसी तरह शेयर बाजार में इकतरफा लालच का कोई मतलब नहीं होता।
  • महात्मा गांधी ने पूंजीपतियों को जनता के धन का ट्रस्टी होने की बात कही थी। मार्क्स-एंगेल्स ने भी पूंजी के स्वामित्व को व्यापक आधार देने की वकालत की थी। लिस्टेड कंपनियां शेयर बाजार के जरिए इसी स्वामित्व का विस्तार करती हैं। लेकिन एक तो हमारे लचर कानून, दूसरे कंपनी के मामलों में आम शेयरधारकों की निष्क्रियता के चलते भारतीय प्रवर्तक जनधन के ट्रस्टी के बजाय उसकी निजी लूटखसोट में व्यस्त हैं। इसे ठीक करने के लिए जरूरी है कि हम शेयरों के बढ़ने-गिरने जितना ही वास्ता इस बात से रखें कि कंपनी सही तरीके चल रही है या नहीं।
  • जब तक लोगबाग किसी चीज को पूछते हैं, तभी तक उसे भाव मिलता है। नज़रों से गिरा दिया तो समझ लीजिए कि गया रसातल में। शेयर बाजार में भी यही होता है। किसी समय राजनीतिक कनेक्शन वाली कंपनियों को बड़े ही महिमामंडित अंदाज में देखा जाता था। किसी बड़े राजनेता से जुड़ाव कंपनी व उसके शेयर के लिए बड़ा सकारात्मक माना जाता था। लेकिन पिछले दो सालों में, खासकर अण्णा हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद निवेशकों ने राजनेताओं से वास्ता रखनेवाली कंपनियों को भाव देना बंद कर दिया है।
  • काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती है और अच्छी चीजें बाज़ार की नज़रों से कभी बच नहीं सकतीं। हम देखें या न देखें, लोगों की पारखी निगाहें ताड़ ही लेती हैं कि मूल्य कहां पक रहा है।

मित्रों, मैं जो भी बताता हूं वह सारी की सारी जानकारी, वे सारे के सारे आंकड़े कहीं न कहीं सार्वजनिक तौर उपलब्ध हैं। आप भी ज़रा-सी कोशिश से इन तक आसानी से पहुंच सकते हैं। मैं कहीं अंदरखाने की खबर नहीं लाता। इसकी पहली वजह तो यह है कि मुझे इस तरह की अंदर की खबरों पर यकीन नहीं है। उनकी निष्पक्षता व सच्चाई पर मुझे संदेह है। डर लगता है कि किसी न प्लांट न कराई हो। दूसरी वजह यह है कि कहीं से मुझे अपने सूत्रों से ऐसी खबरें मिल भी गईं, तो ऐसी अप्रकाशित खबरों से शेयरों के मूल्य को प्रभावित करने की कोशिश गुनाह है। इसे इनसाइडर ट्रेडिंग कहते हैं।

मेरी तो कोशिश यही है जो भी सूत्र निकाला जाए, वह सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सूचनाओं के विश्लेषण पर आधारित हो। हां, इसमें अगर कोई तथ्य छूट जाए तो गलत निष्कर्ष पर पहुंच जाने की पूरी गुंजाइश रहती है। चूक की गुंजाइश है। इसलिए मेरी बातों पर भी आंख मूंदकर यकीन कर लेना गलत होता। उसके अधूरेपन को खुद ढूंढकर पूरा कीजिए। जोखिम उठाने की अपनी स्थिति को तौलिए। फिर, निवेश का फैसला कीजिए।

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