जीडीपी की विकास दर घटने को दो अन्य वजहें ज्यादा संगीन है और भारत की विकासगाथा पर कुठाराघात करती हैं। सरकार टैक्स संग्रह बढ़ने को अपनी नीतियों की सफलता बताती है। जैसे, नवंबर में जीएसटी से ₹1,82,269 करोड़ मिले तो उसने खूब वाहवाही लूटी। लेकिन अवाम से ज्यादा टैक्स वसूलना देश के विकास के लिए घातक है। हमारे यहां केंद्र से लेकर राज्य व लोकल टैक्सों को मिला दें तो वे जीडीपी का 19% बनते हैं, जबकिऔरऔर भी

जीडीपी की विकास दर के धीमा पड़ने की तीन खास वजहें हैं और तीनों की ज़िम्मेदार केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक की नीतियां हैं। पहली है वास्तविक ब्याज दरों का ज्यादा होना। रिजर्व बैंक ने 21 महीनों से रेपो दर (वो ब्याज़ दर जिस पर रिजर्व बैंक बैंकों को दो-तीन दिन का ऋण देता है) को 6.5% पर ही बांधे रखा है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर में रिटेल मुद्रास्फीति की दर 6.21% और खाद्य वस्तुओं वऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था की विकास दर पत्थर पर लिखी इबारत नहीं होती, न लम्बी अवधि की और ना ही छोटी अवधि की। शेयर बाज़ार की तरह उसकी गति कतई रैण्डम भी नहीं होती। अगर ऐसा होता तो नीति बनानेवालों की कोई ज़रूरत ही नहीं होती। सब कुछ भगवान-भरोसे या आज के संदर्भ में कहें तो राम-भरोसे होता। अर्थव्यवस्था या जीडीपी की विकास दर हमेशा सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों से तय होती है। नीतियां सही नहीं रहीं तो सारीऔरऔर भी

एक तरफ ‘मोदी-अडाणी एक हैं’ के नारे का जवाब भाजपा ‘राहुल-सोरोस एक हैं’ से दे रही है। दूसरी तरफ भारत की विकासगाथा की कलई उतरती जा रही है। सितंबर महीना बीतने के बाद 9 अक्टूबर को पेश मौद्रिक नीति में रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही या सितंबर तिमाही में जीडीपी की विकास दर 7%, तीसरी तिमाही में 7.4%, चौथी तिमाही में 7.4% और पूरे वित्त वर्ष में 7.2% का अनुमान उछाला था। लेकिनऔरऔर भी