प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मानें तो देश में रोज़गार की कहीं कोई कमी नहीं है। परसों लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र ने 18 सालों का रिकॉर्ड रोज़गार पैदा किया है। लगा जैसे कि वे सरकार का कोई आंकड़ा दे रहे हों। लेकिन वे दरअसल 23 मई को आए विदेशी बैंक एचएसबीसी के परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) के आधार पर यह दावा कर रहे थे। इस इंडेक्स में कोई आंकड़ाऔरऔर भी

विचित्र-सी हकीकत है कि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। भारत का जीडीपी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ गति से बढ़ रहा है। लेकिन आम लोगों की खपत घटती जा रही है। सरकार की तरफ से 31 मई 2024 को जारी अद्यतन आंकड़ों के मुताबिक इसे दर्शानेवाला निजी अंतिम खपत खर्च (पीएफसीई) वित्त वर्ष 2021-22 में जीडीपी का 58.1% हुआ करता था, जबकि 2023-24 तक घटकर 55.8% रह गया है। निजी खपत बढ़ेगी नहीं तो निजी उद्योगऔरऔर भी

मोदी सरकार ने दस साल में अवाम पर जमकर टैक्स लगाए और उसे सत्ता तंत्र की सेवा में लगाने के साथ-साथ सरकार का पूंजीगत खर्च बढ़ाने में लगा दिया। इससे जहां अंदर-बाहर सबको दिखाने के लिए सड़कों से लेकर हवाई अड्डों समेत तमाम इंफ्रास्ट्रक्चर चमकने लगा, वहीं सरकारी ठेकों से उसके करीबी लोगों व कंपनियों को अच्छा धंधा मिल गया और इनके कमीशन से इलेक्टोरल बॉन्ड के रूप में भाजपा का खजाना भरता चला गया। लेकिन सुप्रीमऔरऔर भी

शेयर बाज़ार बम-बम कर रहा है। निफ्टी और सेंसेक्स बराबर नई ऊंचाई छू रहे हैं। लेकिन यह तेज़ी तभी जारी रह सकती है जब अर्थव्यवस्था का तेज़ विकास होता रहे और यह तभी संभव है जब मोदी सरकार अब साहसी व गंभीर आर्थिक सुधार लागू करे। देश का उद्योग समुदाय, खासकर बड़ी देशी-विदेशी कंपनियां और सीआईआई व फिक्की जैसे उद्योग संगठन ऊपर-ऊपर आश्वस्त हैं कि कमज़ोर राजनीतिक बहुमत के बावजूद मोदी सरकार देश में तमाम मूलभूत आर्थिकऔरऔर भी