जो भी नई सरकार बने, उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए कि अर्थव्यवस्था को झांकी से स्थिति से उबार कर मजबूत धरातल पर खड़ा किया जाए ताकि समाज में विसंगति व असंतुलन खत्म किया जा सके। असल में मोदी सरकार ने झांकी बनाने के चक्कर में पिछले दस साल में अर्थव्यवस्था को विचित्र दुष्चक्र में फंसा दिया है। कहने को अर्थव्यवस्था तेज़ गति से बढ़ रही है। अभी दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। चार-पांच साल मेंऔरऔर भी

लोकसभा नतीजों से साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सारा तिलिस्म टूट गया है और केंद्र में बैसाखी पर टिकी सरकार बनने जा रही है। भाजपा को अपने दम 240 सीट ही मिली है। टीडीपी के 16 और जेडी-यू के 12 सांसदों को साथ लेकर ही नरेंद्र मोदी फिर से सरकार बना पाएंगे। अगर ये दोनों दल अपने 28 सांसदों को लेकर 234 सीटों वाले इंडिया गठबंधन के पाले में चले गए तो वो भी जोड़तोड़औरऔर भी

सोमवार को निफ्टी 3.25% उछला तो मंगलवार को 5.93% टूट गया। एक्जिट-पोल और हवाबाज़ी से बनाई गई बनावटी तेज़ी अंत में फायदे से कहीं ज्यादा नुकसान करा गई। सोमवार को जो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) घबराकर शॉर्ट-कवरिग को मज़बूर हुए थे, हो सकता है कि उन्होंने मंगलवार को शॉर्ट-सेलिंग से सारे नुकसान की भरपाई कर ली हो। लेकिन जो रिटेल ट्रेडर व निवेशक हवाबाज़ी में फंस गए, वे अपने नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते। इसीलिए कहाऔरऔर भी

लोकसभा चुनावों के नतीजे दोपहर बाद तक साफ हो जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह दोनों ने दावा किया है कि आज हमारा शेयर बाज़ार रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। लेकिन अगर मोदीराज वापस नहीं आया और इंडिया गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल गया तो बाज़ार धड़ाम भी हो सकता है। याद कीजिए, बीस साल पहले 2004 में कमोबेश ऐसी ही स्थिति थी। जीडीपी लगभग 8% बढ़ा था। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की लोकप्रियता चरमऔरऔर भी

एक्ज़िट पोल को सही मानें तो मोदी सरकार फिर सत्ता में आने जा रही है। वैसे, असली नतीजे कल मतगणना के बाद ही सामने आएंगे। जो भी हो, मोदी सरकार रहे या इंडिया गठबंधन की सरकार आ जाए, देश की अर्थव्यवस्था को कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। आर्थिक उदारवाद का जो सिलसिला 33 साल पहले 1991 में शुरू हुआ था, वह बदस्तूर जारी रहेगा। हां, इतना ज़रूर होगा कि मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को लेकर जो झांकी बनाती रहीऔरऔर भी