राष्ट्रीय औसत यह है कि भारतीय लोग अपनी आय का 30% हिस्सा हारी-बीमारी या निवेश व आकस्मिक खर्चों के लिए बचाकर रखते हैं। लेकिन निम्न व मध्यम आय वाले घरों में ऐसी बचत 20% से भी कम रहती है। यह हकीकत रेडसीयर के सर्वे से सामने आई है। ऐसे परिवारों की अधिकांश आय खाने-पीने, इलाज और घर के किराए वगैरह पर खर्च हो जाती है। मध्यम वर्ग के 81%, उभरते मध्य-वर्ग के 78% और निम्न-आय वर्ग केऔरऔर भी

पिछले पांच साल में देश का जीडीपी 24.33% बढ़ा है, वो भी मुद्रास्फीति के असर को घटाने के बाद। हमारा जीडीपी वित्त वर्ष 2018-19 में ₹139.81 लाख करोड़ था। सरकार के ताजा अनुमान के मुताबिक 2023-24 में यह ₹173.82 लाख करोड़ रहा है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि देश के 81.35 करोड़ लोग (करीब 58% आबादी) अब भी महीने में सरकार के मुफ्त पांच किलो राशन पर गुजारा कर रहे हैं। हाल ही में आए सलाहकारऔरऔर भी

माना जाता है कि शेयर बाज़ार स्टॉक्स की प्राइस डिस्कवरी या मूल्य की खोज का आदर्श माध्यम है। लेकिन इस बाज़ार में ‘खेला’ होता रहता है। अपने यहां ठीक आम चुनावों के बाद दो दिन में जो ‘खेला’ हुआ, उसका भेद शायद कभी न खुले। लेकिन मामला इतना आसान भी नहीं, जैसा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल बताते हैं कि एक्जिट पोल आने के बाद विदेशी निवेशकों ने ऊंचे भाव पर शेयर खरीदे, जबकि भारतीय निवेशकों ने ज्यादाऔरऔर भी

वित्त वर्ष 2021-22 और 2022-23 के बीच के जिन दो सालों में निफ्टी रीयल एस्टेट सूचकांक 200% बढ़ा है, उसी दौरान कंस्टक्शन क्षेत्र के मजदूरों की औसत मजदूरी घट गई। इसमें भी महिला मजदूरों की हालत ज्यादा खराब रही। इस क्षेत्र में लगभग 80% अकुशल मजदूर काम करते हैं, जिनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी निर्धारित है। लेकिन मशहूर संस्था सीईआईसी के डेटा के मुताबिक 15 से 20 राज्यों में यह न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती। जाहिरऔरऔर भी