जो अड़ता है, वो टूट जाता है और जो ढलता है, वही लम्बा चलता है। परिस्थितियां हमेशा एक-सी नहीं होतीं। हमें उनसे निपटने के लिए उनके हिसाब से ढलना पड़ता है। कुदरत का यह नियम शेयर बाज़ार पर ही लागू होता है। बाज़ार के हर चक्र में एक ही रणनीति नहीं चल सकती। इस समय बाज़ार में अनिश्चितता का जो आलम है, उसके हिसाब से हमें अपनी निवेश रणनीति को ढालना होगा। यकीनन, नज़र अल्पकालिक नहीं, बल्किऔरऔर भी

सरकार में बैठे लोग साफ जानते है कि किसे लूटना और किसे छोड़ना है। हालांकि वे व्यापक अवाम के वोटों से चुनकर ही सरकार में आ सकते हैं तो खुद को हमेशा जनता का सबसे बड़ा हितैषी दिखाते रहते हैं। कितनी विचित्र बात है कि देश और जनता की बात करनेवाली मोदी सरकार सबसे ज्यादा धन देश की संस्थाओं और टैक्स जनता से वसूल रही है। रिजर्व बैंक ने 2017-18 से 2022-23 तक के छह साल मेंऔरऔर भी

संघ प्रचारक से भारत के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी का खास गुण है झूठ बोलना और मोदी सरकार का खास अंदाज़ है सच को झुठला देना। जब विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट आई कि दुनिया भर कोरोना महामारी के कुल लगभग 1.5 करोड़ लोम मारे गए, जिसमें से सर्वाधिक एक तिहाई से भी ज्यादा 47 लाख मौतें अकेले भारत में हुई हैं तो मोदी सरकार ने झूठ-झूठ चिल्लाना शुरू कर दिया। हमारा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय 20 मार्चऔरऔर भी

भारत में बढ़ती आर्थिक विषमता पर दस साल से देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेंद्र मोदी का बयान बेहद उथला और दुखद है। खासकर, तब जब वे और उनका दल भाजपा रामराज्य को अपना आदर्श बताते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है, “राम राज बइठे त्रैलोका, हरषित भए गए सब सोका। बैर न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई।” रामराज्य में आर्थिक ही नहीं, मानसिक विषमता तक की कोई जगह नहींऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही दस साल में देश के 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का दावा करते रहें। लेकिन हकीकत में उनकी नीयत गरीब को गरीब ही बनाए रखने की है। आखिर 81.35 करोड़ लोगों को हर महीने पांच किलो अनाज और 11.8 करोड़ किसानों को हर महीने 500 रुपए की किसान सम्मान निधि देते रहने का क्या तुक है? क्या गरीबों को काम और किसानों को वाजिब दाम नहीं दिया जा सकता?औरऔर भी