गणतंत्र, संविधानप्रदत्त अधिकारों से सम्पन्न नागरिकों का देश। अंग्रेज़ों द्वारा गुलामी के दौरान मॉरीशस लेकर सूरीनाम और दूसरे देशों में बसाए भारतीय वापस लौटकर नहीं आए तो बात समझ में आती है। खाड़ी के देशों में गए कामगार वापस मुल्क नहीं लौट रहे तो वजह साफ है। लेकिन आज जिस तरह गरीब व बेरोज़गार नौजवान ठगों और बिचौलियों का शिकार बनकर भी विदेश जाने को लालायित हैं, प्रोफेशनल अपनी बिकाऊ प्रतिभा के दम पर वर्क वीज़ा हासिलऔरऔर भी

पिछले एक दशक में देश छोड़कर बाहर भाग रहे गरीबों, नौजवानों, प्रोफेशनल्स और अमीरों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है। खुद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में 21 जुलाई 2023 को बताया था कि 2022 में कुल 2,25,260 भारतीयों ने अपनी भारतीय नागरिकता छोड़ी है। 2020 में यह संख्या 85,256 थी। दो साल में ढाई गुना से ज्यादा! वित्त वर्ष 2011-12 से लेकर 2022-23 तक कुल 16,63,440 भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ी है। बीते सालऔरऔर भी

जो सत्ता के रंग में नहीं रंग सकते, दलाली नहीं कर सकते, छद्म राष्ट्रवाद का उम्माद नहीं फैला सकते हैं और भारत से बाहर दुनिया में कहीं सेटल हो सकते हैं, उनमें से ज्यादातर लोग देश छोड़कर भाग रहे हैं। इनमें बड़ी तादाद एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल्स) या अति अमीर लोगों की है। ये लोग बाहर बसने के लिए गोल्डन वीसा खरीद रहे हैं। लंदन की वैश्विक नागरिकता व आवास सलाहकार फर्म हेनली एंड पार्टनर्स की एकऔरऔर भी

जो कभी नहीं हुआ, वो अभी हो रहा है। शुक्रवार, 12 मार्च 1993 को जब सुबह से ही मुंबई बम धमाकों से थर्रा रही है, पूरी मुंबई में 257 लोग मारे गए और 1400 से ज्यादा घाटल हो गए, दोपहर डेढ़ बजे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के बेसमेंट तक में जबरदस्त धमाका हुआ, तब भी अपना शेयर बाजार बंद नहीं हुआ था और उसमें सोमवार 15 मार्च से बाज़ार में बाकायदा ट्रेडिंग होने लगी। बुधवार, 26 मार्च 2008औरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेशकों का साबका बार-बार ‘वैल्यू’ से पड़ता है। वॉरेन बफेट का मशहूर वाक्य है कि ‘प्राइस’ वो है जो आप देते हो और ‘वैल्यू’ वो है जो आप पाते हो। अंग्रेज़ी में पारंगत लोग भले ही इसका अर्थ और मर्म समझ लें। लेकिन हिंदी या अन्य भारतीय भाषाएं बोलने-समझने वाले लोगों को इसमें काफी दिक्कत होती है। प्राइस का अनुवाद कीमत, दाम या भाव हो सकता है और वैल्यू को हम मूल्य कह सकतेऔरऔर भी