जी-20 साल 1999 में बना तो था दुनिया में उभर रहे आर्थिक संकटों से निजात पाने के लिए। लेकिन साल 2008 तक विश्व पटल पर उसकी कोई खास अहमियत नहीं थी। मगर, 2008 के विकट वैश्विक वित्तीय संकट के बाद उसकी भूमिका व प्रासंगिकता बढ़ गई। उसके बाद से हर साल हुए इसके शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के राष्ट्र-प्रमुख, वित्त मंत्री और विदेश मंत्री शिरकत करते रहे। यह मंच जलवायु से लेकर विदेशी ऋण व आपसीऔरऔर भी

देश के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की स्थिति बराबर सुधर रही है। फिर भी वो अभी पूरी क्षमता पर उत्पादन नहीं कर पा रहा। रिजर्व बैंक के अद्यतन सर्वे के मुताबिक बीते वित्त वर्ष 2022-23 में जनवरी-मार्च की चौथी तिमाही में क्षमता इस्तेमाल का स्तर 76.3% रहा है, जबकि इससे पहले की तीन तिमाहियों में यह क्रमशः 74.3%, 74% और 72.4% रहा था। महीने भर पहले छपे रिजर्व बैंक के इस सर्वे में 752 मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों ने भाग लिया।औरऔर भी

भारत की अध्यक्षता में हुए जी-20 के आयोजन को जनता का आयोजन बता दिया जाए तो इससे दुनिया या इसके 20 सदस्यों को क्या मिल जाएगा? लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘जनता का उत्सव’ और भाजपा ने जनता का जी-20 करार दिया है। क्या देश के 60 शहरों में जी-20 के आयोजन करा देना उसे जनता का उत्सव बना देता है? दिल्ली के प्रमुख आयोजन से दिल्लीवासियों को जिस तरह तीन दिन तक दूर रखा गया,औरऔर भी

जी-20 का मूल मकसद राजनीतिक नहीं, बल्कि विश्व की आर्थिक समस्याओं का समाधान निकालना है। इस बार शिखर सम्मेलन में विश्व अर्थव्यवस्था से संबंधित दो ही प्रमुख मुद्दे उभर कर सामने आए। एक, क्रिप्टो करेंसी का संचालन और दो, स्वास्थ्य संबंधी आकस्मिक चुनौतियों से निपटना। क्रिप्टो करेंसी पर साफ हो गया कि इस पर बैन नहीं लगाया जाएगा, लेकिन इसके नियमन पर कोई सहमति नहीं बनी। वहीं, स्वास्थ्य के संबंध में पेशकश की गई कि इस परऔरऔर भी