तेज़ी पर सवार अपने शेयर बाज़ार के लिए पिछले सात दिन किसी झटके से कम नहीं। सब ठीकठाक, कहीं कोई अनहोनी नहीं। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने 19-20 सितंबर को हुई अपनी बैठक में ब्याज दरों को 5.25% से 5.50% की रेंज पर जस का तस रखने का फैसला किया। यह अच्छी खबर थी। फिर भी अपना बाजार गिरता गया। उस शुक्रवार को निफ्टी-50 अब तक के ऐतिहासिक शिखर 20,192.35 पर था, जबकि इस शुक्रवारऔरऔर भी

देश इस समय खतरनाक व नाजुक स्थिति में है। सरकार में एक व्यक्ति की मनमानी चल रही है। संविधान ताक पर रख दिया है। हर तरफ छल-प्रपंच व झूठ व बोलबाला है। सच्चाई सामने नहीं आ रही। अर्थनीति को राजनीति का ग्रहण लग गया है। पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से लेकर 2047 तक भारत को विकसित देश बना देने के शोर के बीच यह सच्चाई छिपा ली जा रही है कि 2014 से 2023 तक के नौऔरऔर भी

विदेशी मीडिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरों को एकदम तवज्जो नहीं देता। विदेशी दौरों में मोदी-मोदी का शोर वही भीड़ लगाती है जिसे संघ व भाजपा का अंतरराष्ट्रीय तंत्र और भारतीय दूतावास खींचकर लाते हैं। अमेरिका से लेकर ब्रिटेन व फ्रांस तक का मुख्यधारा का मीडिया भारत में जो चल रहा है, उसकी जमकर निंदा करता रहता है। हालांकि सरकारों का एजेंडा एकदम अलग रहता है। कारण, किसी को राफेल जैसे हथियार बेचने हैं तो किसी कोऔरऔर भी

हम देश की छवि के बारे में कुएं के मेढक बन गए हैं। सरकारी प्रचार व मीडिया के प्रशस्तिगान से हमें लगता है कि दुनिया में भारत का गुणगान हो रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्वगुरु बन गए हैं। हकीकत यह है कि दुनिया भारत के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाती जा रही है। हाल ही में प्यू रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट को ज़ोर-शोर से प्रचारित किया गया कि दुनिया के 68% लोग मानने लगे हैं किऔरऔर भी