भारत विपुल संभावनाओं से भरा देश है। आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी। हमने अभी तक जो हासिल किया है, वह हमारी अंतर्निहित सामर्थ्य से बहुत-बहुत कम है। लेकिन पूर्णता पाने के लिए सच को आधार बनाना और जिस झूठ ने हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक जीवन को दबोच रखा है, उसे जड़ से मिटा देना ज़रूरी है। असल में, कोई भी विकास सच को आधार बनाकर ही किया जाता है।औरऔर भी

माल उतना ही और वहीं व उसी को बेचो, जहां से पेमेंट जल्दी से जल्दी मिल जाए। पेमेंट में देरी हो गई तो धंधा चौपट हो सकता है। यह सब्जी व किराना स्टोर से लेकर छोटे व बड़े बिजनेस तक का मंत्र है। हम अक्सर कंपनी की लाभप्रदता परखने के लिए इतना भर देखते हैं कि कहीं वह कर्ज के बोझ तले दबी तो नहीं और उसका ऋण-इक्विटी अनुपात हर हाल में एक से कम हो। लेकिनऔरऔर भी

मानते हैं कि अर्थव्यवस्था या जीडीपी के बढ़ने और शेयर बाज़ार के चढ़ने में सीधा रिश्ता है। लेकिन हकीकत ऐसी नहीं दिखती। चीन का जीडीपी जब जमकर बढ़ रहा था, तब वहां का शेयर बाज़ार धीमी गति से चल रहा था। भारत के जीडीपी के विकास दर जब ज्यादा चल रही थी, तब सुस्त गति से बढ़ते अमेरिका के शेयर बाज़ार ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भारत से कहीं ज्यादा रिटर्न दिया था। इस समय भी जब हमाराऔरऔर भी

बीते वित्त वर्ष 2022-23 के मुनाफे/ईपीएस को आधार बनाएं तो सेंसेक्स अभी 25.41 और निफ्टी 23.97 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। निफ्टी-50 में शामिल कंपनियों का शुद्ध लाभ अगले दो साल में 13% की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ता है तो उसका फॉरवर्ड पी/ई घटकर 19 के आसपास आ जाता है। इसलिए कुछ जानकार बाज़ार को सस्ता बता सकते हैं। लेकिन सब कुछ मन का धन है। कंपनियों का मुनाफा ठहरा रहता है, तबऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में सक्रिय सभी लोगों का सम्मिलित मनोविज्ञान शेयरों के भाव और शीर्ष सूचकांकों में झलकता है। इन लोगों में देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों के फंड मैनेजर, हाई नेटवर्थ व्यक्ति (एचएनआई), प्रोफेशनल ट्रेडर और सुलझे हुए धनवान निवेशक तक शामिल हैं। इन सबका आत्मविश्वास, आशावाद व सकारात्मक नज़रिया जब हद से पार चला जाता है तो बाज़ार में अतिशय लालच और निश्चिंतता का सुरूर चढ़ जाता है। सकारात्मक तत्व नकारात्मक हालात पैदा कर देते हैं। इतिहास गवाहऔरऔर भी