यकीनन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग को पकड़ने का कोई विज्ञान नहीं है। नोबेल पुरस्कार पानेवाले अर्थशास्त्री तक ट्रेडिंग का कोई सूत्र पकड़ने से हाथ खड़े कर चुके हैं। बहुत हुआ तो इसे एक हद तक कला कहा जा सकता है। लेकिन यह निरी सट्टेबाज़ी भी नहीं है, न ही इसे सट्टेबाज़ी तक सीमित रखना चाहिए। सट्टेबाज़ी भी करें तो एक पद्धति के साथ, सलीके के साथ, कायदे व अनुशासन में बंधकर। ऐसा कुछ जिससे रिस्क को न्यूनतमऔरऔर भी

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग एकदम फालतू कयासबाज़ी पर टिकी है। इसलिए इसमें किसी रिटेल ट्रेडर को उतरना ही नहीं चाहिए। एचएनआई या संस्थाएं करें तो करें क्योंकि उनके साथ पर्याप्त संसाधन और भरपूर रिस्क लेने की क्षमता होती है। इसमें किसी सलाह का कोई मतलब ही नहीं होता। आखिर बढ़ते हुए बाज़ार में तो हर किसी का धुप्पल लग जाता है। उनकी बात काफी हद तक सही भी है। इसलिए हमें एकऔरऔर भी

सच दो तरह का होता है। एक जाना हुआ सच। दूसरा माना हुआ सच। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग के बारे में जाना और माना हुआ एक ही सच है कि इससे बमुश्किल 1% ट्रेडर ही बराबर मुनाफा कमा पाते हैं। फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में तो खुद पूंजी बाज़ार नियामक, सेबी बड़े डेटा के विश्लेषण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची है। जॉबर और इंट्रा-डे ट्रेडर तो शेयर बाज़ार के दिहाड़ी मज़दूर हैं जो किसी तरह अपनाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार जितना ही पारदर्शी, शेयरों के भावों की खोज उतनी ही सटीक। बाज़ार को पारदर्शी बनाना सरकार और पूंजी बाज़ार की नियामक संस्था, सेबी का दायित्व है, हमारा नहीं। हम जैसे आम निवेशक यहां आंदोलन करने नहीं आए। हमें तो कायदे के निवेश से काम भर का मुनाफा कमाकर संकरी गली से निकल लेना है। फिर भी सवाल तो उठता ही है कि तीन साल में अडाणी ग्रीन का शेयर 5000% से ज्यादा बढ़कर 55 सेऔरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत यकीनन अच्छी नहीं है। लेकिन चूंकि उसके बढ़ने की रफ्तार चीन से ज्यादा है और अंतर्निहित संभावना काफी ज्यादा हैं तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक इस साल मार्च से लेकर अब तक शेयर बाज़ार में बराबर निवेश बढ़ाते जा रहे हैं। उन्होंने 25 मई तक इसमें 54,372 करोड़ रुपए डाले हैं। देश के आम निवेशक भी बाज़ार में सीधे तो नहीं, लेकिन म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों में भरपूर बचत लगा रहे हैं।औरऔर भी