शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में सफलता के लिए दो चीजें बहुत ज़रूरी हैं। एक, घाटा कम से कम हो और दो, हम घाटे के सदमे से जल्दी से जल्दी बाहर निकल आएं। घाटा कम से कम रखने का एक तरीका यह है कि नए ट्रेडरों को स्टॉप-लॉस 2% से ज्यादा नहीं रखना चाहिए। मान लें कि कोई ट्रेडर महीने में दस में से चार सौदों में जीते और छह में हारे। चार में कम से कम 4-4%औरऔर भी

शेयर बाजार के ट्रेडरों की कामयाबी दर क्या है, यह उन्हें तो गिनना ही चाहिए, हमारी पूंजी बाजार नियामक सेबी को भी इसका हिसाब-किताब रखना चाहिए। तभी हम पतंगों की तरह इंट्रा-डे की तरफ उमड़े लाखों व्यक्तिगत ट्रेडरों को सही व व्यावहारिक वित्तीय शिक्षा दे सकते हैं। यूरोप में तो बाकायदा नियम है। इसके तहत सभी ऑनलाइन ब्रोकरों को घोषित करना पड़ता है कि उनके क्लाएंट या ग्राहकों की कामयाबी दर कितनी रही है? आप जानकर चौंकऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में स्टॉप-लॉस का सामना उस्ताद से उस्ताद ट्रेडर तक को करना पड़ता है। बता दें कि विश्वस्तर पर एक रॉबिन कप ट्रेडिंग चैम्पियनशिप होती है। इसके डेटाबेस में ट्रेडिंग और ट्रेडरों के बिजनेस का भरपूर डेटा मिल जाता है। इसके मुताबिक विश्व चैम्पियन स्तर के ट्रेडर बड़ी मुश्किल से 60% से ज्यादा की कामयाबी दर हासिल कर पाते हैं। मतलब, दस में से चार सौदों में उन्हें आम तौर पर घाटा या स्टॉप-लॉसऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग हर नज़रिए से एक तरह का बिजनेस है और हर बिजनेस की तरह इसकी भी खास लागत होती है। दिक्कत यह है कि इंट्रा-डे ट्रेडर इस सच्चाई को सोख नहीं पाते। वे हमेशा जीतना चाहते हैं और हारने पर उनका दिल-दिमाग सब बैठ जाता है। यह नौसिखिया ट्रेडर की मानसिकता है, किसी अनुभवी या कामयाब ट्रेडर की नहीं। असल में जीतने का हुनर तो बहुतेरे लोग सिखाते हैं। इंटरनेट पर ऐसी सामग्री कीऔरऔर भी

सालों-साल से शेयर बाज़ार में घुसनेवाले ज्यादातर ट्रेडर इंट्रा-डे ट्रेडिंग से शुरुआत करते हैं। उनमें न तो लम्बे निवेश का धैर्य होता है और न ही दो-चार दस दिन से लेकर एकाध महीने तक इंताज़ार कर पाने का माद्दा। दिन का दिन में सौदा काटा और निकल गए। आखिर आज का रिस्क कुछ दिन तक क्यों खींचा जाए! इस सोच में कोई समस्या नहीं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश इंट्रा-डे ट्रेडर अपना कोई सिस्टम बनाएऔरऔर भी