शेयर बाज़ार वित्तीय जगत का हिस्सा है। दुनिया भर में वित्तीय जगत का केंद्र अब भी अमेरिका और उसका केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व है। अपने यहां इस वित्तीय जगत का सर्वेसर्वा है भारतीय रिजर्व बैंक। हमें शेयर बाज़ार की चाल को समझना है तो वित्तीय जगत की हर हलचल को हमेशा समझकर चलना होगा। तीन दिन पहले ही शुक्रवार को रिजर्व बैंक ने रेपो या बैंकों को एकाध दिन उधार पर धन देने की ब्याज दर 0.50%औरऔर भी

झोंक में खरीदना और झोंक में बेच देना यह हमारे शेयर बाज़ार के नए-नवेले निवेशकों की बड़ी पुरानी आदत है। पिछले कुछ दिनों से जब से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की खरीद लौटी है और बाज़ार बढ़ने लगा है, आम निवेशक फिर से बावले होने लगे हैं। वे समझने को तैयार नहीं कि निवेश में भावों को गिरने-उठने के कहीं ज्यादा मायने-मतलब रखती है कंपनी की मूलभूत ताकत। कंपनी अगर मजबूत है, उसका धंधा चलना ही चलना हैऔरऔर भी

शक्तिकांत दास ने अगर सामान्य नहीं, आर्थिक इतिहास पढ़ा होता या वित्त मंत्रालय में रहते हुए सत्ता तंत्र के बजाय वित्तीय तंत्र की समझ बना ली होती तो उन्हें भलीभांति पता होता कि भारत जैसे निर्यात से ज्यादा आयात करने देश में विदेशी मुद्रा भंडार का मुख्य काम होता है चालू खाते (माल व सेवा) और पूंजी खाते (ऋण अदायगी से लेकर विदेशी निवेश), दोनों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सौदों को फाइनेंस करना। विदेशी मुद्रा भंडार जितना ज्यादा,औरऔर भी

भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉलर के मुकाबले रुपए को बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का 11% हिस्सा बाजार में झोंक दिया। फिर भी गवर्नर दास कहते हैं कि अर्थव्यवस्था के मूलभूत पहलुओं के मजबूत होने के कारण रुपया कम गिरा है और उभरते देशों ही नहीं, यूरो, जापानी येन व ब्रिटिश पाउंड जैसे विकसित देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले ज्यादा गिरी हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का शोर मचा रहीऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने निकाली 2.74 लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा। लेकिन हमारा विदेशी मुद्रा भंडार इसके ऊपर 53.34 लाख करोड़ रुपए और घट गया। खुद रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास की बात मानें कि इतनी बड़ी रकम डॉलर के सापेक्ष गिरते रुपए को बचाने में लगा दी गई। उनका कहना है, “आयात, ऋणों के मूलधन व ब्याज की अदायगी और पोर्टफोलियो निवेश के निकलने से बाज़ार में विदेशी मुद्रा की सप्लाई मांग के मुकाबलेऔरऔर भी