शेयर बाज़ार में पुराने किस्म के अधिकांश ट्रेडर भावों को भगवान मानते हैं। यह रिटेल ट्रेडर के नज़रिए से एक हद तक सही भी है क्योंकि भावों पर उनका कोई वश नहीं होता। जिस तरह दरिया में दो-चार जग ही नहीं, कई बाल्टी भी पानी डाल देने से कोई फर्क नहीं पड़ता, उसी तरह रिटेल ट्रेडरों की खरीद-फरोख्त का शेयरों के भाव पर कोई खास असर नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है बांध का पानी खोलने से। मुश्किलऔरऔर भी

शेयरों के भावों को कभी दिल पर नहीं लेगे, उनको लेकर भावुक नहीं होंगे, तभी उनके पैटर्न को समझ सकते हैं। देखने की पहली चीज यह है कि किसी शेयर में फिलहाल सटोरियों की कितनी सक्रियता है। यह उसमें डिलीवरी वाले सौदों के प्रतिशत से पता चल जाता है। बीएसई व एनएसई की वेबसाइट हर शाम इसकी जानकारी दे देती है। अगर ऐसे सौदे 60-70% से ज्यादा है तो यह उन्हें खरीदने का पहला सिग्नल है। बाकीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार लिस्टिंग कंपनियों के उठते-गिरते भावों का ही खेल है। यहां आधे से ज्यादा सौदे तो सटोरियों के होते हैं, जिनका सचमुच खरीदने-बेचने से कोई वास्ता नहीं होता। वे तो बस भाव बोलते हैं और दिन के दिन में भावों का अंतर काटकर निकल जाते हैं। मसलन, शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज़ में डिलीवरी वाले सौदे 45.44%, विप्रो में 42.19%, टाइटन में 46.67% और भारती एयरटेल में 33.59% ही थे। वैसे, डिलीवरी वाले सौदों का आधे सेऔरऔर भी

आज के दौर में सबसे मुश्किल काम है कमाना। दिक्कत यह है कि काम ही नहीं मिल रहा तो कमाएंगे कैसे? कहते हैं कि खोजने पर तो भगवान भी मिल जाता है। फिर काम कैसे नहीं मिलेगा? लेकिन करोड़ों लोगों को लाख खोजने पर भी काम नही मिल रहा। कमाने के बाद की कड़ी है बचाना। बचाने के बाद उसे बढ़ाना।  की जुगत। बचत को कहीं लगाया नहीं तो मुद्रास्फीति दीमक की तरह खा जाएगी। इसलिए उसेऔरऔर भी

डर इस बात का है कि जरा-सी आशा और गहरी निराशा के बीच डूबते-उतराते शेयर बाज़ार में सालोंसाल से ट्रेड कर रहे प्रोफेशनल व रिटेल ट्रेडर कहीं अंततः हाथ न खड़ा कर दें। बोल पड़े कि यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो। ट्रेडरों के लिए इसका कोई व्यावहारिक समाधान तो नहीं नज़र आता। लेकिन विकल्प हो तो उन्हें कुछ समय के लिए निवेशक बन जाना चाहिए। बाजार का कोई भरोसा नहीं। मंदी के माहौल मेंऔरऔर भी