हो पाएगा ₹80 का डॉलर कभी ₹70 का!
सारा लेनदेन रुपए में। सारी ट्रेडिंग रुपए में। उस शेयर बाज़ार में जहां डॉलर को रुपए में बदलकर निवेश व ट्रेडिंग करनेवाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का पलड़ा सबसे ज्यादा भारी है। ऐसी स्थिति में रुपया अगर डॉलर के मुकाबले गिरता जा रहा है तो इसका कारण व निदान समझना ज़रूरी हो जाता है। नहीं तो हाल उस पादरी जैसा हो जाएगा जो नदी के मंझधार में डूबती बड़ी नांव में ईश्वर का शुक्रिया इस बात के लिएऔरऔर भी
बचत सूत्र 12 महीने, 20% और 80% का
अपने ही सुख के बारे में सोचते-सोचते हम अक्सर दुख से दबे रहते हैं। फॉर्मूला याद नहीं रखते कि “दुख तुम्हें क्या तोड़ेगा, तुम दुख को तोड़ दो। बस अपनी आंखें औरों के सपनों से जोड़ दो।” देश में इस वक्त 80% लोग बमुश्किल गुजर-बसर कर पाते हैं जबकि नेता-अभिनेता, क्रिकेटर, दलाल, ठेकेदार व धंधेबाज़ों से मिलकर बनी 5% आबादी का कैश-फ्लो इतना है कि उन्हें बचाने की ज़रूरत नहीं। बाकी बचे 15% लोग ही अपनी बचतऔरऔर भी
भागते विदेशी निवेशक, आती देशी बचत
पानी हमेशा नीचे भागता है और अंततः या तो धरती में सोख लिया जाता है या नदी व समुंदर में समा जाता है। लेकिन धन हमेशा ऊपर उसी तरफ भागता है जहां वह ज्यादा बढ़ सकता है। इस समय मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए अमेरिका समेत तमाम विकसित देश ब्याज दर बढ़ाते जा रहे हैं। इससे वहां के सरकारी बांडों की यील्ड बढ़ गई है और रुपया खोखला होता जा रहा है तो विदेशी निवेशक नौऔरऔर भी
भाव भगवान नहीं, इनके खातों के भरोसे
संस्थागत निवेशक शेयर बाजार में कभी भावों को भगवान नहीं मानते। उन्हें अच्छी तरह पता है कि वे भावों को अपनी खरीद या बिकवाली के दम पर आसमान पर पहुंचा या पाताल तक गिरा सकते हैं। इन संस्थागत निवेशकों में तमाम एफपीआई के साथ-साथ देशी म्यूचुअल फंड और एलआईसी जैसी बीमा कंपनियां शामिल हैं। हां, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की ताकत देशी सस्थाओं पर अक्सर भारी पड़ती है। इनका प्रमाण है एचडीएफसी और इन्फोसिस जैसी दमदार कंपनियोंऔरऔर भी







