शेयर बाज़ार गिरता ही जा रहा है। पिछले तीन महीनों में रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन में आर्थिक सुस्ती, अमेरिका से लेकर अपने यहां मुद्रास्फीति और ब्याज दरों के बढ़ते जाने जैसे नकारात्मक कारकों ने निवेशकों को अंदर से हिलाकर रख दिया है। इस दौरान बिजली और ऑयल एंड गैस छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों के शेयर सूचकांक गिरे हैं। अच्छी-खासी कंपनियों के शेयर डूबे जा रहे हैं। रुपए इतना कमज़ोर हो गया है कि 77.5 रुपए में एक डॉलरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिग के रिस्क को जड़ से नहीं मिटाया जा सकता। मिट गया तो यहां निवेश करना सरकारी बॉन्डों में धन लगाने जैसा हो जाएगा। लेकिन रिस्क कम हो जाने से रिटर्न भी कम हो जाएगा। हां, शेयर बाज़ार के रिस्क को कम से कम ज़रूर किया जा सकता है। साफ समझ बना लें कि रिस्क ऐसा दुश्मन है जो कभी सामने से नहीं, हमेशा पीछे से वार करता है। वो खुलकर नहीं,औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में हमेशा सामनेवाले का स्वभाव, उसके एक्शन का पैटर्न समझना ज़रूरी है। लेकिन रिस्क को न्यूनतम करना है तो सबसे पहले अपने स्वभाव व पैटर्न की कमियां खत्म करनी होंगी। रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों में अक्सर एक आदत यह देखी गई है कि वे बड़ी नहीं, छोटी कंपनियों के पीछे भागते हैं। दूसरे, उन्हें कैश काटता है। उन्हें किसी लती जुआरी की तरह ट्रेडिंग का नशा होता है। वे हर दिन कोई नऔरऔर भी

रिस्क को कैसे समझें और कैसे उसे न्यूनतम करें? यह निवेश और ट्रेड करनेवालों के लिए पहली और सबसे बड़ी चुनौती है। इससे निपट लेने के बाद दूसरी चुनौती यह आती है कि न्यूनतमं रिस्क उठाते हुए शेयर बाज़ार से अधिकतम रिटर्न कैसे हासिल करें? सबसे पहले, पहली चुनौती। रिस्क शेयर बाज़ार के सौदों मे नहीं होता, बल्कि इसमें जो लोग भाग ले रहे हैं उनके बर्ताव, उनके व्यवहार, उनके स्वभाव में होता है। माइक्रोस्कोप लेकर भीऔरऔर भी

तमाम एनालिस्ट सारी सलाहों के बाद डिस्क्लेमर लगाते हैं कि उन्होंने जिन स्टॉक्स की चर्चा की, उनमें उनका कोई एक्सपोज़र या निवेश नहीं है। दरअसल, वे शेयर बाज़ार के रिस्क से घबराकर किसी स्टॉक में धन लगाने का जोखिम ही नहीं उठाते। उसी तरह जैसे हलवाई अपनी बनाई मिठाई चखता है, लेकिन खाता नहीं और रेस्टोरेंट वाला रेस्टोरेंट से नहीं, घर से खाना मंगाकर खाता है। दूसरों को कहते फिरते हैं कि चढ़ जा बेटा शूली पर,औरऔर भी