शेयर बाज़ार में लंच-टाइम में अल्गोरिदम बनाकर सौदा करनेवाले ट्रेडर बड़े उस्ताद होते हैं। उनके जटिल खेल का अंदाज़ा तब लगता है जब स्टॉक्स के भावों में काफी उतार-चढ़ाव के चलते दूसरे ट्रेडरों के स्टॉप-लॉस ट्रिगर होने लगते हैं। समझदार ट्रेडर हमेशा स्टॉप-लॉस का पालन अनुशासन व कड़ाई के साथ करते हैं। लेकिन लंच-टाइम में जब वोल्यूम कम और ओपन इंटरेस्ट घट रहा होता है, तब भावों के पैतरों को देखकर उस्तादों के भी होश फाख्ता होऔरऔर भी

कहा जाता है कि शेयर बाज़ार खोलते हैं नौसिखिया रिटेल ट्रेडर, जबकि बंद करते हैं प्रोफेशनल ट्रेडर। लंच के दौरान शेयर बाज़ार में अमूमन सन्नाटा रहता है। अधिकांश लोग निश्चित समय पर एकदम निश्चिंत होकर लंच करते हैं। केवल अल्गोरिदम ट्रेडिंग चलती है। यह सिस्टम आधारित ऑर्डर एंट्री होती है जिन्हें ग्रे व ब्लैक बॉक्स से जुड़े सॉफ्टवेयर मशीनी ढंग से पूरा करते हैं। करीब एक से ढाई बजे तक बाज़ार का वोल्यूम काफी घट जाता है।औरऔर भी

थोड़ी-सी पूंजी और बहुत सारे ख्वाब लेकर शेयर बाजार में उतरे हमारे-आप जैसे रिटेल ट्रेडर बड़ी बेचैन आत्मा होते हैं। मन में कोई स्टॉक कौंधा तो लगता है कि फटाफट खरीद लिया जाए, अन्यथा हाथ से निकल जाएगा। वहीं, जिन ट्रेडरों को घाटा लग रहा होता है, वे सुबह-सुबह सौदे से निकलकर अपना घाटा कम से कम के लिए व्यग्र रहते हैं। दरअसल, हर दिन शेयर बाज़ार के शुरुआती घंटे ऐसी ही बेचैन आत्माओं के लिए होतेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में सक्रिय शक्तियों के संतुलन और उनकी हरकतों को ठीक से समझे बगैर रिटेल ट्रेडर दलाल स्ट्रीट से सही-सलामत नहीं निकल सकता। ये शक्तियां किसी मशीन, अल्गोरिदम या कंप्यूटर सॉफ्टवेयर में नहीं, बल्कि इनके पीछे काम कर रहे इंसानों में निहित हैं। शक्तियों का संतुलन समझना है तो हमें वहां सक्रिय इंसानों के ट्रेडिंग व्यवहार व स्वभाव को बारीकी से देखना होगा। उनका पैटर्न समझना होगा। हमारी पूंजी बहुत सीमित है, जबकि उनके पास इफरातऔरऔर भी

लम्बे निवेश के बारे में तरह-तरह की धारणाएं हैं। कुछ विशेषज्ञ पांच-दस साल तो कुछ ‘खरीदो व भूल जाओ’ की बात करते हैं। लेकिन हर धारणा समय से बंधी है। समय के साथ उसकी मार या उपयोगिता मिटती रहती है। मसलन, आज के दौर में जब अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे विकसित देशों का बेहद सस्ता धन भारत जैसे उभरते देशों के शेयर बाज़ार की तरफ अंधाधुंध बह रहा है, तब बड़ी से लेकर छोटी कंपनियों तकऔरऔर भी