भारतीय रिजर्व बैंक और उसके गवर्नर शक्तिकांत दास ने अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कृषि क्षेत्र से बड़ी उम्मीद लगा रखी है। दास का कहना है, “कृषि व संबंधित गतिविधियां ग्रामीण मांग को आवेग देकर हमारी अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार का नेतृत्व कर सकती हैं।” सही बात है। नेतृत्व ज़रूर कर सकती हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था का पूरा उद्धार नहीं कर सकतीं क्योंकि हमारे जीडीपी में कृषि, वानिकी व मत्स्य पालन जैसी संबंधित गतिविधियो का योगदान घटते-घटते 14 प्रतिशतऔरऔर भी

सीधी-सी बात है कि किसी शेयर/स्टॉक के भाव और शेयर बाज़ार के सूचकांक तभी बढ़ते हैं जब उन्हें खरीदनेवाले ज्यादा ही आतुर हों। लेकिन सवाल उठता है कि जब सारी दुनिया में कोरोना का कहर बरपा हो और अर्थव्यस्था में धन भयंकर की तंगी हो, तब शेयरों को खरीदने इतना तगड़ा धन आ कहां से रहा है?  यह धन है अमेरिका, जापान और यूरोप से बेहद कम ब्याज पर लिए गए उधार का। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आज़ाद भारत के इतिहास में अर्थव्यवस्था कभी भी इतनी भयंकर गिरी नहीं थी। बेरोजगारी 40 साल के चरम पर। फैक्ट्रियों में पूरा उत्पादन शुरू नहीं हुआ। बैंकों के गले में एनपीए का फंदा ज्यादा कस गया। आईएमएफ ने इस साल जीडीपी के 10.3% और रिजर्व बैंक ने 9.5% घटने का अनुमान लगाया है। फिर भी सेंसेक्स दोबारा 40,000 तक जा पहुंचा है। आखिर शेयर बाज़ार में छाए इस उन्माद की वजह क्या है? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दुविधा का दौर है। निफ्टी, सेंसेक्स कभी उछल जाते हैं तो कभी निपट जाते हैं। कुछ स्टॉक्स बढ़े चले जा रहे हैं तो कुछ उठने का नाम नहीं ले रहे। ऐसे में समझदारी से किया गया निवेश भी गलत साबित हो सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि जब तक शेयर बाज़ार सामान्य अवस्था में नहीं लौट आता, तब तक हम जितना धन निवेश करना है, उसका आधा ही लगाएं। बाकी कैश बचाकर रखें। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

पंद्रह-बीस साल पहले शेयर बाज़ार के ट्रेडर को बहुत सारी गणनाएं खुद करनी पड़ती थी। अब तो स्टॉक एक्सचेंज का सॉफ्टवेयर ही तमाम ज़रूरी गणनाएं व चार्ट बना कर दे देता है। इंट्रा-डे से लेकर स्विंग व मोमेंटम ट्रेड उन्हीं 140 स्टॉक्स में करना चाहिए जिनमें डेरिवेटिव ट्रेडिंग भी होती है। इनमें से सबसे अधिक चंचल, बढ़त, वोल्यूम, ओपन इंटरेस्ट व सबसे ज्यादा मार्केट वायड पोजिशन लिमिट बढ़ने वाले स्टॉक मुफीद होते हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी