कृषि में दम नहीं अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का

भारतीय रिजर्व बैंक और उसके गवर्नर शक्तिकांत दास ने अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कृषि क्षेत्र से बड़ी उम्मीद लगा रखी है। दास का कहना है, “कृषि व संबंधित गतिविधियां ग्रामीण मांग को आवेग देकर हमारी अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार का नेतृत्व कर सकती हैं।” सही बात है। नेतृत्व ज़रूर कर सकती हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था का पूरा उद्धार नहीं कर सकतीं क्योंकि हमारे जीडीपी में कृषि, वानिकी व मत्स्य पालन जैसी संबंधित गतिविधियो का योगदान घटते-घटते 14 प्रतिशत पर आ चुका है, जबकि देश की श्रमशक्ति का 45 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा उसी पर लदा हुआ है। ऊपर से कोरोना के चलते गांव लौटे मज़दूरों के वापस लौटने की रफ्तार बहुत धीमी है।

रिजर्व बैंक के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार गांवों में मनरेगा के तहत काम की मांग जून से सितंबर तक के चार महीनों में क्रमशः 74.2 प्रतिशत, 73.6 प्रतिशत, 66.6 प्रतिशत और 71.1 प्रतिशत बढ़ गई। जाहिर है कि यह मांग शहरों से लौटे मजदूरों के कारण बढ़ी है। मजदूरों की सप्लाई ज्यादा होने से उनकी मजदूरी नहीं बढ़ पा रही है। यह ग्रामीण मांग के बढ़ने में एक बाधा है। हालांकि, किसानों के दम पर इस साल ट्रैक्टरों की बिक्री साल भर पहले की समान अवधि की तुलना में जून में 22.4 प्रतिशत, जुलाई में 38.5 प्रतिशत और अगस्त में 74.7 प्रतिशत बढ़ी है। दोपहिया वाहनों की बिक्री जून में 38.6 प्रतिशत और जुलाई में 15.2 प्रतिशत घटने के बाद अगस्त में 3 प्रतिशत बढ़ गई है। इसी तरह उर्वरकों की बिक्री उक्त तीन महीनों में साल भर पहले की अपेक्षा क्रमशः 10.9 प्रतिशत, 25.4 प्रतिशत और 8.1 प्रतिशत बढ़ी है।

फिर भी हम ग्रामीण मांग को लेकर बहुत निश्चिंत नहीं हो सकते क्योंकि देश में कोरोना का कहर धीमा पड़ने के बावजूद अभी खत्म नहीं हुआ है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने तो जाडों में कोरोना के तेज़ी से बढ़ने की एडवांस चेतावनी दे रखी है। यह भी सच है कि ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक देश में 30 जून से 30 सितंबर के बीच 1000 से ज्यादा कोरोना मरीज़ों वाले जिलों में ग्रामीण जिलों का अनुपात 20 प्रतिशत से बढ़कर 53 प्रतिशत हो चुका है। याद रखें कि ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य का सारा तंत्र भगवान भरोसे है। वहां कोरोना का प्रकोप बढ़ा तो कटनी से बोवाई तक में भारी खलल पड़ सकता है और दूसरी आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं।

दूसरी आर्थिक गतिविधियों की भूमिका कोई कम नहीं है। नीति आयोग के आंकड़ों के हिसाब से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 39 प्रतिशत के आसपास है। बाकी 61 प्रतिशत हिस्सा अन्य गतिविधियों का है। यह सही कि चालू वित्त वर्ष 2020-21 की जून तिमाही में जब हमारा जीडीपी 23.9 प्रतिशत का गोता लगा गया, तब केवल कृषि इकलौता ऐसा क्षेत्र था जो 3.4 प्रतिशत बढ़ा था। साथ ही इस बार मानसून औसत से अच्छा रहा है। इसके चलते पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक खरीफ फसलों की पैदावार पिछले साल के मुकाबले 0.8 प्रतिशत ज्यादा 1445.2 लाख टन रहेगी।

इसलिए कृषि के मोर्चे पर हम निश्चिंत हो सकते हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था के कई प्रमुख क्षेत्र ग्रामीण जीवन को काफी प्रभावित करते हैं। ग्रामीण इलाकों की आर्थिक गतिविधियों में खनन, मैन्यूफैक्चरिंग व कंस्ट्रक्शन का हिस्सा क्रमशः 53.4 प्रतिशत, 51.3 प्रतिशत और 48.7 प्रतिशत है। मैन्यूफैक्चरिंग व कंस्ट्रक्शन क्षेत्र तो ग्रामीण रोज़गार में क्रमशः 47.4 प्रतिशत व 74.6 प्रतिशत का योगदान करते हैं। ये उद्योग क्षेत्र अभी तक कोरोना से उपजे संकट से मुक्त नहीं हो पाए हैं। इसलिए कृषि व किसानों की हालत बेहतर होने का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि इससे ग्रामीण इलाकों में मांग बढ़ जाएगी। एक गणना के मुताबिक कृषि से ज्यादा से ज्यादा 5.5 प्रतिशत मांग ही बढ़ सकती है।

सवाल उठता है कि देश में बाकी 84.5 प्रतिशत मांग कहां से जाएगी क्योंकि अर्थव्यवस्था के उद्धार का सारा दारोमदार मांग बढ़ाने पर ही टिका है। मांग नहीं पैदा की गई तो नया निवेश भी नहीं आएगा क्योंकि उद्योग पहले से ही मात्र 65 प्रतिशत क्षमता पर उत्पादन कर रहे हैं। इस बीच सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान पैकेज़ के अंतर्गत कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन व खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और प्रशासनिक सुधारों के लिए आठ विकास योजनाएं निर्धारित की हैं और इनके लिए 1.6 लाख करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। साथ ही उसने कृषि में निजी पूंजी को खींचने के लिए तीन नए कानून पेश किए हैं। दिक्कत यह है कि पंजाब से लेकर हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान इन कानूनों का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं।

फिलहाल, कोरोना की सिहरन और राजनीतिक बेचेनी के बीच गांवों में त्योहारी सीज़न दस्तक देने लगा है। किसान धनतेरस से लेकर दशहरा, दीपावली पर नई खरीद से खुशी मनाना चाहता है। पेप्सिको जैसी कंपनी को भी भरोसा है कि त्योहारी सीज़न के उभार से स्नैक्स से लेकर जूस और सॉफ्ट ड्रिंक तक की मांग बढ़ जाएगी। खेती-किसानी से निकली इस मांग से अर्थव्यवस्था को थोड़ी गति मिल सकती है। लेकिन हिंदीपट्टी के गांवों में एक कहावत चलती है कि मूस मोटइहैं, लोढ़ा होइहैं। चूहा मोटा भी हुआ तो आखिर कितना! असली चुनौती यह है कि कृषि और किसानों के बीच स्थाई खुशी कैसे लाई जा सकती है? इसके लिए कृषि की उत्पादकता बढ़ानी और कृषि की सालाना विकास दर सालों-साल तक 4 प्रतिशत से ज्यादा रखनी होगी।

(यह लेख 19 अक्टूबर 2020 को दैनिक जागरण के मुद्दा पेज़ पर छप चुका है)

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