लालच, लिप्सा या तृष्णा हमारा विवेक हर लेती है, दिमाग बंद कर देती है, आंखों पर काला-घना परदा डाल देती है। लगता है कि चांद पेड़ की फुनगी पर ही बैठा है। सीढ़ी लगाकर या किसी तरह चढ़कर वहां पहुंच गए तो चांद अपनी मुठ्ठी में होगा। यह अगर ‘मैया मैं तो चंद्र खिलौला लइहौं’ जैसा बाल-हठ होता तो चल जाता। लेकिन बड़े ऐसा बचपना करने लग जाएं तो सर्व-सत्यानाश हो जाता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग जब तक पेशा है, तब तक ठीक है। लेकिन अगर वह नशा बन जाए तो सबसे पहले आपको बरबाद करती है और उसके बाद आपके परिवार को। कारण, वह आपकी लालच को हवा देती है जिसके चढ़ते ही केवल सफलता दिखाई देती है, विफलता नहीं। रिटर्न दिखाई देता है, रिस्क नहीं। लेकिन इस धंधे का रिस्क ऐसा है कि भगवान भी अगर आ जाए तो उसे मिटा नहीं सकता। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

भारत का पता नहीं, लेकिन दुनिया के आधे निवेशक चिंतित हैं कि मंदी आने ही वाली है और शेयर बाज़ार कभी भी क्रैश हो सकते हैं। विश्व की जानी-मानी बीमा कंपनी एलियांज़ लाइफ के ताज़ा सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है। चालू साल की पहली तिमाही में निराशा से घिरे ऐसे निवेशक 46% और दूसरी तिमाही में 48% थे, जो तीसरी तिमाही में 50% हो गए। तथास्तु में आज ऐसी कंपनी जिसे मंदी मार नहीं सकती…औरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था के सुस्त पड़ने और आगे इसकी हालत बिगड़ते जाने की आशंका कतई निराधार नहीं है। मगर भारत की सुदीर्घ विकासगाथा का अंत अभी नहीं हुआ है और न ही अगले 10-15 सालों में होगा। हमारे यहां इतनी तगड़ी उद्यमशीलता है कि उसे अगर माकूल सरकारी नीतियों का साथ मिल जाए तो भारत 10 साल में चीन के समकक्ष और 15 साल में उससे भी आगे निकल सकता है। यह होकर रहेगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अपने यहां कंपनियों के प्रवर्तक भी शेयर बाज़ार के अहम खिलाड़ी हैं। आखिर कंपनी के वर्तमान व भविष्य के बारे में उनसे बेहतर कौन जान सकता है। इधर जब भी बाज़ार में अफरातफरी मची है, तब यस बैंक जैसे अपवादों को छोड़ दें तो प्रवर्तकों ने घबराकर अपने शेयर नहीं बेचे हैं। इसके विपरीत तमाम प्रवर्तकों ने बाज़ार से शेयर खरीदकर कंपनियों में अपनी इक्विटी हिस्सेदारी बढ़ाई है। यह काफी शुभ लक्षण है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी