सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में जैसी कटौती की है, उससे भारत दुनिया का मैन्यूफैक्चरिंग हब बन सकता है। भारत इस पैमाने पर सिंगापुर व वियतनाम के बराबर आ गया है। इसलिए दुनिया की कंपनियां भारत का रुख कर सकती हैं। इससे यहां पूंजी-निवेश का नया दौर शुरू हो सकता है। आज़ादी के बाद अब तक के सात दशक में बड़े पूंजी-निवेश के ऐसे छह चक्र चल चुके हैं। आगे सातवें की तैयारी है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था स्वस्थ बदलाव की दिशा में बढ़ रही है। खराब बैंक व वित्तीय कंपनियां खत्म हो रही हैं। अब तो जो एकदम फिट होंगे, वही टिक पाएंगे। सरकार भी उन धंधों से निकलती जा रही है जिसमें उसे रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। भारत पेट्रोलियम, कंटेनर कॉरपोरेशन, बीईएमएल व शिपिंग कॉरपोरेशन जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से सरकार निकलने जा रही है। संक्रमण की पीड़ा जल्दी ही खत्म हो सकती है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

समय का पहिया बिना रुके चलता जा रहा है। एक संवत बीता। दूसरा शुरू हुआ। भारतीय शेयर बाज़ार के कारोबारी विक्रम संवत के हिसाब से नया साल मनाते हैं। बीते विक्रम संवत 2075 में निफ्टी ने 10.8% और सेंसेक्स ने 9.8% रिटर्न दिया है। लेकिन यह बढ़त मुठ्ठी भर स्टॉक्स तक सीमित रही। इस दौरान शेयर बाज़ार के अधिकांश निवेशकों का पोर्टफोलियो इस कदर टूटा कि वे बीते संवत को भुला नहीं पाएंगे। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

गंगोत्री से गंगा की धारा के साथ बहते पत्थर का ऊबड़-खाबड़ टुकड़ा हज़ारों किलोमीटर की रगड़-धगड़ के बाद शिव बन जाता है, मंगल का प्रतीक बन जाता है। आंख में ज़रा-सा कण पड़ जाए तो हम इतना रगड़ते हैं कि वह लाल हो जाती है। लेकिन सीप में परजीवी घुस जाए तो वह उसे अपनी लार से ऐसा लपटेती है कि मोती बन जाता है। ऐसे ही हैं हमारे रीति-रिवाज़ और त्योहार जो हज़ारों सालों की यात्राऔरऔर भी

दीपावली का चक्र है। ऋतुओं का चक्र है। दीपावली को हम भले ही धन की देवी लक्ष्मी से जोड़ दें, लेकिन इसका असली वास्ता खेती के चक्र से रहा है। वहीं, धन का कोई चक्र नहीं होता। जहां से शुरू करो, वहीं से उसका चक्र बन जाता है। दीपावली का बहाना अच्छा है। कमाने का ख्याल अच्छा है। लेकिन सतर्क बुद्धि और सही दांव से कभी भी कमाया जा सकता है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी