पहले देश में विदेशी वस्तुओं का क्रेज़ था। अब विदेशी पूंजी का क्रेज़ चढ़ गया है। इसे खींचने की लालसा आमलोगों से कहीं ज्यादा सरकार में है। हमारे प्रधानमंत्री खुद घूम-घूमकर विदेशी निवेशकों को न्यौता दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें कोई दिक्कत होगी तो वे संभाल लेंगे। विदेशियों से इतना अपनापा ठीक नहीं क्योंकि वे भारत या भारतवासियों का नहीं, अपना फायदा देखकर ही यहां धन लगा रहे हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हमारा समूचा वित्तीय-तंत्र भ्रष्ट है। बड़ों के हितों का पोषण और आम लोगों का शिकार करता है। यह हर्षद मेहता के समय से चल रहा है और आज भी बदस्तूर जारी है। वित्तीय साक्षरता का नारा यूपीए सरकार लगाती थी और एनडीए सरकार भी नकारती नहीं। लेकिन असली खेल से अनजान लोगों की लालच का फायदा उठाकर उन्हें ठगा जा रहा है। हमें यह जाल तोड़कर खुद नई राह निकालनी होगी। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

दिक्कत यह है कि आम भारतीय जिस एलआईसी को गाढ़े-वक्त का साथी मानते हैं, उसे हमारी सरकार ने अपना एटीएम बना रखा है। जहां कहीं निवेश करना हो, वह एलआईसी की गाढ़ी निधि का सहारा लेने लगी है। यहां तक कि सरकारी कपंनियों के शेयर बेचने या विनिवेश के कार्यक्रम में कोई नहीं मिला तो सारी बिक्री एलआईसी के मत्थे मढ़ दी जाती है और एलआईसी को मजबूरन उनका दाम चुकाना पड़ता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

एलआईसी के प्रति आम भारतीय निवेशकों में अविश्वास पैदा करना लगभग असंभव है। बैंकों व पोस्ट ऑफिस की सुरक्षित जमा के बाद लोगों के जेहन में एलआईसी का ही नंबर आता है। आम भारतीय पीढ़ियों से एलआईसी की पॉलिसी को सोने या फिक्स डिपॉजिट रसीद की तरह लॉकर में सुरक्षित रखते आए हैं। यह अलग बात है कि वे इसे निवेश मानते हैं, जबकि असल में वह जोखिम का बीमा कवच मात्र है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले हफ्ते कांग्रेस ने एक प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया कि सरकार एलआईसी के धन का दुरुपयोग कर रही है और किसी दिन हालत ऐसी हो सकती है कि एलआईसी को बंद करना पड़ जाए। लेकिन यह आशंका काफी अतिरंजित लगती है। फिलहाल एलआईसी का बिजनेस मॉडल सुरक्षित नज़र आता है। वह अपने कुल निवेश का लगभग 65% हिस्सा केंद्र व राज्य सरकार के सुरक्षित व अधिक ब्याज वाले बॉन्डों में लगाती है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी