चक्रवात हो या सुनामी, उसके आगे छोटे-बड़े या अमीर-गरीब, सभी का रिस्क एक जैसा होता है। इसी तरह बाज़ार का रिस्क संस्थाओं से लेकर रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों तक समान रहता है। फर्क बस इतना है कि दोनों इस रिस्क को अलग तरीके से देखते और उससे निपटते हैं। रिटेल ट्रेडर हमेशा टिप्स पकड़ने के लिए हर किसी से पूछता है कि बाज़ार कहां जाएगा, जबकि संस्थाएं बाज़ार का मूड जानने के लिए। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

हिंदी समाज के ज्यादातर बुद्धिजीवी शेयर बाज़ार को हिकारत की नज़र से देखते हैं। उन्हें नहीं दिखता कि यह समृद्धि में हिस्सा बांटने का बेहद लोकतांत्रिक तरीका है। आम आदमी कंपनी तो नहीं बना सकता। लेकिन वो शेयर बाज़ार के माध्यम से अच्छी से अच्छी कंपनी के मालिकाना में अंश खरीद सकता है। वैसे भी इधर भारत-पाक तनाव ने अच्छी कंपनियों के शेयर थोडा सस्ते कर दिए हैं। तथास्तु में पेश है ऐसी ही एक अच्छी कंपनी…औरऔर भी