जीवन में कुछ भी स्थिर और शाश्वत नहीं। चीजें अपने विलोम में बदल जाया करती हैं। उसी तरह शेयर बाज़ार में कोई ट्रेन्ड हमेशा के लिए नहीं होता। बाज़ार चक्रों में चलता है। स्टॉक भी कंपनी के मूलभूत पहलू बदलते ही विपरीत ट्रेन्ड पकड़ लेते हैं। मसलन, चार साल से नई ऊंचाइयां पकड़ता रहा जुबिलैंट फूड्स एक साल से गिरता जा रहा है तो उसके मोह से मुक्त हो जाना चाहिए। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में तीन ट्रेन्ड होते हैं। अप-ट्रेन्ड, डाउन-ट्रेन्ड और साइड-वेज़। सिदधांततः तीनों ही ट्रेन्ड में ट्रेडिंग से कमाया जा सकता है। डाउन-ट्रेन्ड में बाज़ार व शेयरों के गिरने पर शॉर्ट सौदों से कमा सकते हैं। मगर, ये सौदे केवल एफ एंड ओ सेगमेंट में किए जा सकते हैं जिसमें न्यूनतम लॉट 5 लाख रुपए का है। वहीं साइड-वेज़ में सीमित रेंज के कारण ज्यादा फायदा नहीं मिलता। तब अप-ट्रेन्ड ही बचता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेन्ड एक ऐसी चीज़ है जिसे बिना समझे ट्रेडिंग से कमाया नहीं जा सकता है। दो से छह साल (ज्यादा लंबा), छह महीने से दो साल (लंबा), दो महीने से छह महीने (मध्यम) और अभी से दो महीने पहले (अल्पकालिक)। समय के ये चार फ्रेम हैं जिनमें बाज़ार या किसी स्टॉक के ट्रेन्ड को देखा-समझा जाता है। ट्रेन्ड को समझना लगता बड़ा आसान है। लेकिन बड़े-बड़े दिग्गज भी इसमें धोखा खा जाते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

संस्कृत की सदियों पुरानी कहावत है महाजनो येन गतः स पन्थाः। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में भी यह सूक्ति चलती है कि ‘ट्रेन्ड इज़ योर फ्रेन्ड’ और हमेशा ट्रेन्ड के साथ ट्रेड करो। लेकिन कभी ध्यान से सोचने की कोशिश कीजिए कि यह ट्रेन्ड आखिर बनता कैसे है? कौन उसकी चाल का आगाज़ करता है? फिर कभी-कभी तो कोई ट्रेन्ड ही नहीं होता और शेयर बाज़ार सीमित रेंज में कदमताल करते रहते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी