उन्हें बनना है तीसमार-खां, हमें नहीं
जब भी हम ट्रेडिंग की कोई सेवा लेते हैं तो पहला सवाल यही पूछते हैं कि उसके सही होने की दर या स्ट्राइक रेट क्या है। लेकिन किसी समझदार ट्रेडर के लिए यह सवाल एकदम बेमानी है। दरअसल, यह ब्रोकरेज फर्मों के एनालिस्टों का मानदंड है क्योंकि इससे वे अपने को तीसमार-खां साबित करते हैं। इसके लिए वे घाटेवाले ट्रेड को लंबा खींचते और मुनाफेवाले ट्रेड को बीच में ही काट देते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी
सिक्का उछलता जाए, प्रायिकता नहीं
पांच बार सिक्का उछालने पर टेल निकला तो हमें लगता है कि छठीं बार हेड आना पक्का है। हमें अहसास नहीं कि हेड या टेल आने की प्रायिकता हमेशा 50% ही रहेगी, भले ही हज़ार क्या, लाख बार सिक्का उछाल लें। सहजबोध की यही गलती हम ट्रेडिंग में करते हैं। कई बार स्टॉस-लॉस लगता जाए तो मान बैठते हैं कि अगली बार फायदा ही होगा। यह कतई यथार्थपरक और तर्कसंगत सोच नहीं है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी
ट्रेडिंग हर किसी के वश की बात नहीं
हर कोई फटाफट नोट बनाना चाहता है। इसलिए बहुतेरे लोग अधीर होकर शेयर बाजार की तरफ दौड़ते हैं। ट्रेडिंग से जमकर कमाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि ट्रेडिंग हर किसी के लिए नहीं है। इसके लिए शांत मन, साफ समझ और तगड़े अनुशासन की ज़रूरत होती है। अस्थिर मन, सुनी-सुनाई बातों या टिप्स के भीगे भागने और झटके में फैसले लेनेवाले यहां लंबे समय तक नहीं टिक पाते। अब गहते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी
तथ्य और तर्क सही, बाकी है रिस्क
अतीत व वर्तमान के सारे तथ्य जुटा लेने के बावजूद हम अक्सर फैसला नहीं कर पाते क्योंकि भविष्य में क्या होगा, नहीं जानते। जो हुआ नहीं है, उसका पता लगाया भी कैसे जा सकता है! फिर धंधे का प्रबंधन किसी और के हाथों में हो, तब भविष्य आंकने में ज्यादा ही अनिश्चितता है। यही है शेयरों में निवेश का रिस्क। हां, हमें अपने तथ्य व तर्क जरूर सही रखने पड़ते हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी






