फिराक़ गोरखपुरी की महशूर लाइनें हैं – अब अक्सर चुप-चुप से रहे है, यूं ही कभू लब खोले है; पहले फिराक़ को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले है। भारतीय रिजर्व बैंक से रघुराम राजन के जाने के बाद कुछ ऐसी ही कमी कम से कम कुछ महीनों तक तो सालती ही रहेगी। इसलिए नहीं कि वे बिना लाग-लपेट बेधड़क अपनी बात रख देते थे, बल्कि इसलिए कि आज के नौकरशाही तंत्र में उनकी जैसी बौद्धिकऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडर शेयर बाज़ार में आते-जाते रहते हैं। लेकिन देशी, विदेश निवेशक संस्थाएं बाज़ार में बराबर टिकी हुई हैं। रिट्रेल ट्रेडर हमेशा चाहता है कि बाज़ार बढ़े तो वो खरीदे और गिरे तो वो बेचे। लेकिन गौर करें तो हर दिन देशी और विदेशी संस्थाएं अमूमन एक-दूसरे से उल्टा रुख अपनाती हैं। विदेशी खरीदते हैं तो देशी बेचते हैं या इसका उल्टा होता है। दोनों ही सही हैं क्योंकि दोनों ही कमाते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी