विकास है, पर मूल्य-सृजन कितना!
अच्छी कंपनी उतनी ही मेहनत में ज्यादा मूल्य पैदा कर लेती है। विकसित देश वो है जो एकसमान मेहनत व संसाधनों में ज्यादा मूल्य सृजित करता है। साथ ही समान मेहनत के वो ज्यादा दाम देता है। अपने यहां कामगार को ज्यादा वेतन देता है और समाज में ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध कराता है। विकास का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक वो मूल्य नहीं पैदा करता। तथास्तु में विकास व मूल्य-सृजन में लगी एक कंपनी…औरऔर भी
मुद्रास्फीति बांधना है तो ब्याज बढ़ाएंगे
केंद्र सरकार ने नई व्यवस्था यह की है कि अब ब्याज दरों का फैसला रिजर्व बैंक के गवर्नर नहीं, बल्कि छह सदस्यों की समिति करेगी जिसमें तीन सदस्य रिजर्व बैंक और तीन सरकार द्वारा मनोनीत अधिकारी होंगे। साथ ही सरकार ने अगले पांच साल के लिए मुद्रास्फीति को 4% तक बांधे रखने का लक्ष्य किया है। जाहिर है कि मुद्रास्फीति कम रखने के लिए ब्याज दर बढ़ाने की कसरत की जाती रहेगी। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी
विश्व भर में केंद्रीय बैंकों की धांधागर्दी
बाज़ार में किसी दूसरी चीज़ की तरह पूंजी के दाम का फैसला भी मांग और आपूर्ति के संतुलन से होना चाहिए। मांग ज्यादा, आपूर्ति कम तो ब्याज दर बढ़े। मांग कम तो ब्याज घटे। लेकिन दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस मामले में खुल्लमखुल्ला धांधागर्दी चला रहे हैं। अमेरिका ने नोट छापकर सिस्टम में डालने का काम 2008 में शुरू किया। 2009 में यूरोप और 2010 में जापान ने ऐसा किया। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी
सब बाजार के हवाले, ब्याज क्यों नहीं!
आज सब कुछ बाज़ार के हवाले है तो माना जाता है कि सरकार नहीं, बल्कि बाज़ार को ही सारे आर्थिक संतुलन का फैसला करने देना चाहिए। चीन समाजवादी देश है तो वहां सरकार का वर्चस्व समझ में आता है। लेकिन बाज़ार अर्थव्यवस्था में गहरा यकीन रखनेवाले अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे देशों में पूंजी के दाम या ब्याज दर का फैसला आखिर सरकार की तरफ से वहां के केंद्रीय बैंक क्यों करते हैं? अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी






