इधर टिप्स देनेवालों के साथ ही धंधेबाज़ों की एक नई जमात पैदा हो गई है जो आपको ‘फाइनेंशियल फ्रीडम’ दिलाने का दावा करते हैं। क्लासेज़ चलाते हैं। 25-30 हज़ार से लेकर लाख-डेढ़ लाख तक फीस लेते हैं। ये चार्ट, वो चार्ट। तरह-तरह की एनालिसिस। बाबाओं के अंदाज़ में चमत्कार और गुरु-चेले की फांस। लेकिन उनकी बातों का सार बस इतना है कि ट्रेडिंग भी थोक में खरीदकर रिटेल में बेचने का व्यापार है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

भीड़भाड़ वाली सड़क पर अगर पांच सौ का नोट गिरा पड़ा हो तो सावधान हो जाइए क्योंकि हो सकता है कि कुछ लोग आपको छकाने की मस्ती कर रहे हों। इसी तरह ट्रेडिंग में आसानी से नोट नहीं बनते। देशी-विदेशी दिग्गज यहां मैदान में डटे हैं। उनके बीच उतरकर नोट कमाना शेर के जबड़े से शिकार खींचने जैसी बहादुरी है। लेकिन ट्रेडिंग में बहादुरी नहीं, समझदारी चलती है जो अभ्यास से आती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग चुटकी बजाकर अमीर बनाने का धंधा नहीं है। यहां सरकारी बांडों या बैंकों की एफडी जैसी सुरक्षा नहीं है। यहां तो दीर्घकालिक निवेश जैसी निश्चिंतता भी नहीं है। यह एक तरह का बिजनेस है। टैक्स के लिहाज से भी इसे बिजनेस ही माना गया है और इससे हुई आय पर उसी हिसाब से टैक्स लगता है। शेयरों की ट्रेडिंग में उतरनेवालों को यह बुनियादी बात हमेशा याद रखनी चाहिए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

4 दिसंबर 2014 से 4 दिसंबर 2015 के बीच बीएसई-500 सूचकांक 5.5% गिरा है। लेकिन इन 500 कंपनियों में से 130 ऐसी हैं जिन्होंने 15% से ज्यादा रिटर्न दिया है। सबसे ज्यादा 296.7% रिटर्न राजेश एक्सपोर्ट्स ने दिया है। साफ है कि गिरते बाज़ार में भी चयन सही हो तो कमाने के भरपूर मौके हैं। लेकिन हर चमकनेवाली चीज़ सोना नहीं होती क्योंकि राजेश एक्सपोर्ट्स से भी मजबूत कंपनी उसी के उद्योग में है। आज यही कंपनी…औरऔर भी

अमेरिका ही नहीं, यूरोप व जापान तक में नोट छापकर बाज़ार में डालने का सिलसिला चला हुआ है। ब्याज दर लगभग शून्य है। ऐसे उधार पर 2-4% सालाना रिटर्न भी मिल जाए तो निवेशकों की मौज। इसी बेहद सस्ते धन के दम पर दुनिया भर के बाज़ार चढ़े हुए हैं। सालोंसाल से अमेरिकी कंपनियों का धंधा और मुनाफा ठहरा हुआ है। फिर भी डाउ जोन्स सूचकांक ऐतिहासिक चोटी तक चला गया। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी