अगर आपको कहीं अंदर से लगता है कि शेयर बाज़ार को सिर्फ बढ़ना ही बढ़ना है तो आप अभी निवेश/ट्रेडिंग के लिए तैयार नहीं हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्ती/मंदी भी आएगी और शेयर बाज़ार में गिरावट भी आएगी। यह अकाट्य सत्य है। अगर यह आपके गले नहीं उतरता तो आप यथार्थ नहीं, भ्रम में जी रहे हैं। और, भ्रमों की दुनिया में ख्याली पुलाव पकाए जा सकते हैं, कमाई नहीं की जा सकती। अब बुधवार का ट्रेडिंग बौद्ध-सूत्र…औरऔर भी

अलग-अलग टाइमफ्रेम की ट्रेडिंग के नियम व तनाव अलग हैं। इंट्रा-डे में आपको उस तरह चौकन्ना रहता पड़ता है जैसे आप छह महीने के छोटे बच्चे की देखभाल कर रहे हों। वहीं फ्यूचर्स व ऑप्शंस में आपको दो दिन में सौदा काटकर निकल जाना चाहिए। उसमें भी चौकन्ना रहना बेहद जरूरी है। लेकिन स्विंग व मोमेंटम ट्रेड में कोई खास तनाव नहीं। दिन में जब चाहे सौदा करो। अपने मिजाज के हिसाब से टाइमफ्रेम चुनें। अब आगे…औरऔर भी

छोटे-मोटे शेयरों की बात अलग है। लेकिन पूरे बाज़ार की चाल इस वक्त डॉलर की चाल से जुड़ चुकी है। इस अमेरिकी मुद्रा ने भारत ही, दुनिया भर के बाज़ारों में खरमंडल मचा रखा है। पिछले साल मई से उसका तूफान कुछ ज्यादा ही बढ़ गया। टैपरिंग भयंकर चक्रवात की तरह हर वक्त बाज़ारों के सिर पर मंडराता रहता है। बांड खरीद के घटने-बढ़ने से बाज़ार की सांस उठती-गिरती है। ऐसे में परखते हैं बाज़ार की चाल…औरऔर भी

थोड़े समय तक शेयर बाज़ार सनकी जैसा अतार्किक बर्ताव कर सकता है और शेयरों के भाव असली मूल्य से दूर पड़े रह सकते हैं। पर, लंबे समय में भाव हमेशा सच्चे मूल्य पर आ जाते हैं। यह बात बेंजामिन ग्राहम ने अस्सी साल पहले 1934 में अपनी किताब ‘सिक्यूरिटी एनालिसिस’ में लिखी थी। वॉरेन बफेट ग्राहम को अपना गुरु मानते हैं। भाव सबको दिखते हैं, असली मूल्य को पकड़ना चुनौती है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

हर दिन हमारे अपने शेयर बाज़ार मं डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपए इधर से उधर होते हैं। ब्रोकर समुदाय तो इस पर 0.1% का कमीशन भी पकड़ें तो हर दिन मजे से 200 करोड़ रुपए बना लेता है। लेकिन हमारे जैसे लाखों लोग ‘जल बिच मीन पियासी’  की हालत में पड़े रहते हैं। बूंद-बूंद को तरसते हैं। सामने विशाल जल-प्रपात। लेकिन हाथ बढ़ाकर पानी की दो-चार बूंद भी नहीं खींच पाते। पास जाएं तो जल-प्रपात झागऔरऔर भी