अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) को भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में की गई 0.50 फीसदी की कटौती रास नहीं आई है। उसने बुधवार को भारत पर जारी अपने खास वक्तव्य में कहा है कि रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति में किसी भी वृद्धि को थामने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने को तैयार नहीं रहना चाहिए। उसका कहना है कि भारत को वाजिब विकास दर को हासिल करने के लिए आर्थिक सुधारों को गति देने की जरूरत है। आईएमएफऔरऔर भी

हमारे कॉरपोरेट जगत और उसकी तरफ से लामबंदी करने वाले उद्योग संगठनों को भारतीय लोकतंत्र की जमीनी हकीकत की कितनी समझ है, इसकी एक बानगी पेश की है जानेमाने संगठन, कनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने। मंगलवार को सीआईआई के सालाना अधिवेशन को खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपनी मौजूदगी से नवाजा था। उसी अधिवेशन में सीआईआई की एक टास्क फोर्स ने चुनाव सुधारों पर एक विस्तृत रिपोर्ट मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी को सौंपी,औरऔर भी

अगर रिजर्व बैंक को डर है कि आगे मुद्रास्फीति बढ़ सकती है तो यह निराधार नहीं है। बुधवार को सरकार की तरफ से जारी मार्च के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक ने यह बात साबित कर दी। इन आंकड़ों के अनुसार मार्च 2012 में यह सूचकांक मार्च 2011 की तुलना में 9.47 अधिक है। दूसरे शब्दों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति की दर मार्च में 9.47 फीसदी है। इसके पिछले महीने फरवरी में यह 8.83 फीसदीऔरऔर भी

भारतीय रुपया बुधवार को डॉलर के सापेक्ष तीन महीने के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। दिन भर में जितना भी बढ़ा था, शाम तक सारा कुछ धुल गया। विदेशी मुद्रा डीलरों को लगता है कि रिजर्व बैंक ने ब्याज दर में जितनी कटौती करनी थी, कर दी है। आगे इसकी गुंजाइश बेहद कम है। आज खुद रिजर्व बैंक के गवर्नर दुव्वरि सुब्बाराव ने भी कह दिया कि मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम कायम है, इसलिए ब्याज दरों कोऔरऔर भी

जब बाजार के प्रमुख खिलाड़ी लोकल नहीं, ग्लोबल हों तो देश की जमीन से उठी अच्छी लहरों को बाहर के झोंके उड़ा ले जाते हैं। ब्याज दरों में अप्रत्याशित कटौती से बाजार ऊपर-ऊपर चल रहा था। अमेरिका से भी बाजार के बढ़ने का आधार पीछे था। दस बजे तक निफ्टी 5342 तक चढ़ चुका था। लेकिन सूरज के सिर पर पहुंचते ही यूरोपीय बाजारों के कमजोरी के साथ खुलने के समाचार आ गए तो भारतीय बाजार भीऔरऔर भी

अजीब विरोधाभासों से भरा देश है अपना। यहां की 60 फीसदी से ज्यादा श्रमशक्ति कृषि पर निर्भर है। लेकिन खेतों में काम करने के लिए मजदूर नहीं मिलते। मिलें भी तो कैसे? जहां 80 फीसदी से ज्यादा किसानों के पास ढाई एकड़ से कम जमीन हो और देश में जोतों का औसत आकार दस साल पहले 2001-02 में ही 3.5 एकड़ पर आ चुका हो, वहां मजदूर खेती-किसानी में काम करें भी तो किसके यहां। यहां तोऔरऔर भी

इस दुनिया में हम अकेले ही आए हैं और अकेले ही जाएंगे। हमें जो भी करना है, अकेले ही करना है। इसमें घर-परिवार, दोस्त या समाज का कोई अन्य सदस्य योगदान करता है तो यह उसकी मेहरबानी है। हमें इसके लिए उसका कृतज्ञ होना चाहिए।और भीऔर भी