दूर तलक जाएगा सफाई अभियान

मुद्रास्फीति का मुद्दा सुलझ गया। मिस्र का गुबार थमता नजर आ रहा है। अब बचा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का मसला तो वह भी 31 मार्च 2011 तक किनारे लग जाएगा क्योंकि तब तक इस पर एफआईआर दाखिल हो चुकी होगी। जहां तक कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों और संबंधित लोगों की गिरफ्तारी की बात है तो बाजार को इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए? यह जानामाना सच है कि कॉरपोरेट क्षेत्र के बहुत से लोगों की मिलीभगत राजनेताओं के साथ होती है और वे इसका नाजायज फायदा उठाते हैं। अगर यह साबित हो जाए और उन्हें सजा दी जाए तो इसमें गलत ही क्या है?

जल्दी ही यह साफ-सफाई अभियान ऐसा सकारात्मक असर पैदा करेगा कि हमारे राजनेता कॉरपोरेट जगत से सीधे रिश्ते रखने से परहेज करने लगेंगे। वे बंद दरवाजों के पीछे एजेंटों के जरिए डीलिंग-सेटिंग करने को मजबूर हो जाएंगे। मेरे विचार से यह सफाई अभियान सही दिशा में जा रहा है और यह अंततः भारत में एफआईआई को ज्यादा निवेश करने में मददगार साबित होगा। असल में यह एक वजह है कि जिसके चलते मैं कहता आया हूं कि आप मजबूत, पर ऐसी साफ-सुथरी कंपनियों में निवेश करें जिनमें दूर-दूर तक इस तरह की दुरभिसंधि की गुंजाइश न हो।

मैंने आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पढ़ा कि डी बी रीयल्टी का संकट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का संकट बन सकता है क्योंकि शरद पवार के नजदीकी रिश्ते डी बी रीयल्टी के साथ-साथ एचसीसी से रहे हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एनसीपी के साथ कड़ाई से पेश आ रही हैं। यही बात डीएमके के मामले में भी सच है। इससे यह भी आभास मिलता है कि मैडम को किसी भी सूरत में प्रधानमंत्री का बदला जाना गवारा नहीं है।

राजनीतिक हलकों में दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस के भीतर का कोई शख्स चाहता है कि प्रधानमंत्री कमजोर पड़ जाएं और उनकी जगह किसी और को बैठा दिया जाए। यही वजह है कि इसरो, काले धन या सरकार के दूसरे विभागों के दस्तावेज मीडिया तक पहुंचाए जा रहे हैं। लेकिन हर किसी को हर बात पता है। इसलिए चाहनेवाले का मंसूबा शायद ही पूरा हो पाए। मंदड़ियों ने यह सारा जोड़तोड़ दिमाग के किसी कोने में बैठा रखा है। लेकिन उनका सारा गणित फेल हो सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल के पिछले फेरबदल के वक्त ही कह दिया था कि अगला फेरबदल वे बजट के बाद करेंगे।

एनसीपी प्रमुख शरद पवार से खाद्य मंत्रालय हटाना काम का कदम साबित हुआ क्योंकि इसके बाद मुद्रास्फीति गिरी है और अगले मंत्रिमंडल फेरबदल तक गिरती रहेगी। कमजोर कड़ियां मंत्रिमंडल से बाहर फेंक दी जाएंगी। भ्रष्टाचार ने सभी राजनीतिक पार्टियों के दामन को दागदार कर रखा है। इसलिए इस समय कोई भी पार्टी मध्यावधि चुनाव नहीं चाहती। यह बात कांग्रेस अच्छी तरह जानती है, समझती है।

अभी सिस्टम में जिस तरह की साफ-सफाई चल रही है, वह निश्चित रूप से नए बदलाव को जन्म देगी। यह अच्छी पहल है और मै इसका स्वागत व समर्थन करता हूं। मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब लोगों को राजनेताओं और सरकारी अफसरों के खिलाफ किसी स्वतंत्र एजेंसी के पास शिकायत दर्ज कराने की खुली छूट मिल जाएगी।

इस बीच मंदड़ियों से मुझे यही कहना है कि बाजार को जितना भी चाहो तोड़ लो, लेकिन अगर तुम फंडामेंटल्स के बिना अपनी सीमाओं के पार जाकर ऐसा करोगे तो यह सिस्टम किसी भी वक्त तुम्हें उठाकर बाहर फेंक देगा। यह बात ध्यान में रखना। चाहो तो इसे गांठ बांध कर रख लो।

जिस तरह दौलत पैदा किए बगैर हम उसे भोगने के हकदार नहीं होते, उसी तरह खुशी पैदा किए बगैर उसे पाने का हक भी हमें नहीं होता।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ है। लेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं उलझना चाहता। सलाह देना उसका काम है। लेकिन निवेश का निर्णय पूरी तरह आपका होगा और चक्री या अर्थकाम किसी भी सूरत में इसके लिए जिम्मेदार नहीं होगा। यह कॉलम मूलत: सीएनआई रिसर्च से लिया जा रहा है)

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