सरकार की तरफ से कहा जाता है कि उसने 2014 में डूबने के कगार पर पहुंच चुकी देश की अर्थव्यवस्था को बचा लिया। निहित स्वार्थों के चलते सरकार से जुड़े देशी-विदेशी कॉरपोरेट संस्थान और अर्थशास्त्री तक बताने से नहीं थकते कि भारत को 2014 में नाज़ुक अवस्था में पहुंच चुकी दुनिया की पांच कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था, जबकि आज वह सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। हकीकत यह है कि मार्च 2014 से मार्चऔरऔर भी

सात दिन पहले सरकार का आखिरी अनुमान आया कि वित्त वर्ष 2022-23 में देश का जीडीपी 160.06 लाख करोड़ रुपए रहा है जो पिछले वित्त वर्ष 2021-22 के जीडीपी 149.26 लाख करोड़ रुपए से 7.2% ज्यादा है। तालियां बजती रहीं कि यह तो 7% के पिछले अनुमान को भी पार कर गई। लेकिन इसे कृषि की 4% और सेवा क्षेत्र की 9% विकास दर के दम पर हासिल किया गया है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर इसऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर देश में गरीबी और बेरोज़गारी की सही स्थिति से बनती है। वर्तमान सरकार ने गरीबी का कोई आधिकारिक आंकड़ा 2014 में सत्ता में आने के बाद से जारी ही नहीं किया। वहीं, बेरोजगारी को मापने का यहां न तो अंतरराष्ट्रीय पैमाना है और न ही देश की हकीकत के अनुरूप। 140 करोड़ आबादी में से जिन 80-81 करोड़ गरीबों का सरकार हर महीने 5 किलो मुफ्त अनाज देती है, वे बेरोज़गार रहना गवाराऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान की एक जनसभा में दावा किया कि दुनिया के बड़े-बड़े विशेषज्ञ बोल रहे हैं कि भारत अति गरीबी को समाप्त करने के बहुत निकट है। वेदों की तरह शब्द को ही प्रमाण मान लिया जाए तो मोदी की बात सच मान ली जाएगी। लेकिन विश्व बैंक ने अक्टूबर 2022 में जारी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में सबसे ज्यादा लोग अति गरीबी में जी रहे हैं। 2019 में 13.70 करोड़ लोगऔरऔर भी

इतिहास गवाह है कि चाहे देश हो, समाज हो, अर्थव्यवस्था हो या बाज़ार, झूठ ज्यादा नहीं चलता और अंततः जीत सत्य की ही होती है। कारण यह है कि झूठ के आधार पर कोई विकास हो ही नहीं सकता। बाज़ार में झूठ चलाते रहा जाए तो वह किसी दिन भयंकर असंतुलन और संकट को जन्म दे देता है। साल 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट इसका सबसे ताज़ातरीन उदाहरण है जब अमेरिका के वित्तीय जगत में चलाए जाऔरऔर भी

हर रिटेल ट्रेडर को अपने माफिक स्टॉक्स चुन लेने चाहिए और उन्ही में ट्रेड करना चाहिए। ऐसे स्टॉक्स की लिस्ट 25-30 शेयरों की हो सकती है। ये सभी किसी न किसी सूचकांक में शामिल होने ही चाहिए। जिन शेयरों में ट्रेड करना हो, उनका स्वभाव पकड़ने की कोशिश करें। वे कहां से उठते, कहां से गिरते हैं और उनमें किस तरह के लोग सक्रिय हैं? शेयरों के दैनिक व साप्ताहिक चार्ट पर गौर करेंगे तो उनके भावोंऔरऔर भी

क्या-क्या जान लें तो शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाने का चांस बढ़ सकता है? सबसे पहले जान लें कि किसी शेयर से जुड़ी कंपनी के फंडामेंटल्स क्या हैं, इससे उसमें निवेश की रणनीति तो बनाई जा सकती है, लेकिन ट्रेडिंग की नहीं। इसलिए अपनी सीमा समझें और खबरों के पीछे भागना छोड़ दें क्योंकि रिटेल ट्रेडर तक अखबारों, बिजनेस चैनलों या ऑनलाइन मीडिया से जब तक कोई खबर पहुंचती है, उससे काफी पहले उस्तादों तक पहुंचऔरऔर भी

यकीनन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग को पकड़ने का कोई विज्ञान नहीं है। नोबेल पुरस्कार पानेवाले अर्थशास्त्री तक ट्रेडिंग का कोई सूत्र पकड़ने से हाथ खड़े कर चुके हैं। बहुत हुआ तो इसे एक हद तक कला कहा जा सकता है। लेकिन यह निरी सट्टेबाज़ी भी नहीं है, न ही इसे सट्टेबाज़ी तक सीमित रखना चाहिए। सट्टेबाज़ी भी करें तो एक पद्धति के साथ, सलीके के साथ, कायदे व अनुशासन में बंधकर। ऐसा कुछ जिससे रिस्क को न्यूनतमऔरऔर भी

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग एकदम फालतू कयासबाज़ी पर टिकी है। इसलिए इसमें किसी रिटेल ट्रेडर को उतरना ही नहीं चाहिए। एचएनआई या संस्थाएं करें तो करें क्योंकि उनके साथ पर्याप्त संसाधन और भरपूर रिस्क लेने की क्षमता होती है। इसमें किसी सलाह का कोई मतलब ही नहीं होता। आखिर बढ़ते हुए बाज़ार में तो हर किसी का धुप्पल लग जाता है। उनकी बात काफी हद तक सही भी है। इसलिए हमें एकऔरऔर भी

सच दो तरह का होता है। एक जाना हुआ सच। दूसरा माना हुआ सच। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग के बारे में जाना और माना हुआ एक ही सच है कि इससे बमुश्किल 1% ट्रेडर ही बराबर मुनाफा कमा पाते हैं। फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में तो खुद पूंजी बाज़ार नियामक, सेबी बड़े डेटा के विश्लेषण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची है। जॉबर और इंट्रा-डे ट्रेडर तो शेयर बाज़ार के दिहाड़ी मज़दूर हैं जो किसी तरह अपनाऔरऔर भी