शेयर बाज़ार ही नहीं, किसी भी बाज़ार में भाव तभी बदलते हैं जब डिमांड और सप्लाई का संतुलन टूटता है। इस तरह बनते असंतुलन को प्रोफेशनल ट्रेडर पहले ही भांप लेते हैं। वे चार्ट पर देख लेते हैं कि कहां एफआईआई, बीमा कंपनियां, म्यूचुअल फंड और बैंक जैसे बड़े संस्थागत निवेशक खरीद-बेच रहे हैं। प्रोफेशनल ट्रेडर यह भी जानते हैं कि सामने भावनाओं व अहंकार में डूबा एक शेखचिल्ली ट्रेडर बैठा है। हमें प्रोफेशनल ट्रेडर बनना है…औरऔर भी

रुपया डॉलर के मुकाबले इस साल 9.27% गिर चुका है। सोमवार को 61.21 की ऐतिहासिक तलहटी छूने के बाद 60.62 पर बंद हुआ। हर तरफ हाहाकार है कि रसातल में जाता रुपया अब संभाला नहीं जा सकता और वो अपने साथ अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार को भी डुबा देगा। पर सच यह है कि उसकी कमज़ोरी ही एक दिन मजबूती का सबब बनेगी। आयात घटेंगे, निर्यात बढ़ेंगे, रुपया सबल होगा। इस चक्र को समझते, बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

मैं गलत कैसे हो सकता हूं? एक-न-एक दिन साबित हो जाएगा कि मैंने जो फैसला लिया, वो कितना सही था। कुछ ऐसा ही सोचकर हम पुराने फैसलों से चिपके रहते हैं और अपने सही होने का इंतज़ार करते हैं। वक्त सरकता जाता है, पर हमें सही साबित करने का वक्त कभी नहीं आता। जीवन में यह सोच भले चल जाए, लेकिन शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से चिपक जाए तो बरबाद कर डालती है। अब आज का अध्याय…औरऔर भी

यकीन मानिए, तथास्तु शेयर बाज़ार में लंबे निवेश की सबसे विश्वसनीय और अपने तरह की इकलौती सेवा है। कीमत मात्र 200 रुपए/महीने। इतना भी इसलिए ताकि हम अपना काम जारी रख सकें। एक पुरानी बानगी। अजंता फार्मा में 1 अगस्त 2011 को जब हमने निवेश की सलाह दी थी तब उसका दस रुपए का शेयर 347.10 पर था। अभी पांच रुपए का शेयर 987.15 पर है। दो साल में 5.68 गुना! यह कमाल है बस एक मिसाल…औरऔर भी

पिछले कुछ महीनों से शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग के बारे में गंभीरता से पढ़ रहा हूं तो लग रहा है कि यहां कितने चौकन्नेपन और फुर्ती की मांग है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। हमारी सोच, भावना और बर्ताव में ऐसी चीजें घुसी हुई हैं, जो हमारी ही दुश्मन हैं। सोच की लगाम हमारे अवचेतन के हाथ में है जिसे हम जानकर नहीं, मानकर चलते हैं। इसे जानकरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार 99% मौकों पर 99% लोगों को चरका पढ़ाता है। इसलिए बाकी 1% लोगों में शामिल होना और 1% सीमित मौकों को पकड़ना बेहद कठिन है। जीवन में आशावाद आगे बढ़ने का संबल बनता है, वहीं शेयर बाज़ार में निराशावाद कामयाबी की बुनियाद बनता है। हर सौदे के पहले सोचना चाहिए कि इसमें कितना घाटा संभव है, जबकि हम यही सोचते हैं कि इससे कितना फायदा कमा सकते हैं। अब करें सोच को पलटने का अभ्यास…औरऔर भी

नोट छापना आसान है, कमाना नहीं। वरना हर कोई शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से जमकर कमा रहा होता। आम सोचवालों के लिए ट्रेडिंग से कमाई शेर के जबड़े से शिकार निकालने जैसा काम है। सामने बैठे हैं उस्तादों के उस्ताद, जो भीड़ की हर मानसिकता का इस्तेमाल बखूबी करते हैं। अक्सर कम सतर्क लोगों को छकाने के लिए झांसा/ट्रैप बिछाते हैं जो दिखता है शानदार मौका, लेकिन फंसाते ही निगल जाता है। अभी क्या है इनका ट्रैप…औरऔर भी

ट्रेड में घुसते ही स्टॉप-लॉस लगाना जरूरी है। शेयर अनुमानित दिशा में उठने लगे तो स्टॉप-लॉस को उठाते जाएं। अगर शॉर्ट-सेल किया है और शेयर लक्ष्य की दिशा में गिरने लगे तो स्टॉप-लॉस को नीचे ला सकते हैं, लेकिन कभी भी ऊपर न करें। इसी तरह लांग सौदों में स्टॉप-लॉस को उठा तो सकते हैं, लेकिन कभी भी नीचे न लाएं। सौदे को और मोहलत देने की सोच सिर्फ-और-सिर्फ हराती है। अब रुख आज के बाज़ार का…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के पुराने लोग राधा कृष्ण दामाणी को अच्छी तरह जानते होंगे। उन्हें ओल्ड फॉक्स, आरके, मिस्टर ह्वाइट जैसे कई नामों से जाना जाता है। उन्हें अपना गुरु मानते हैं राकेश झुनझुनवाला। सालों पहले किसी ने उनसे पूछा कि बाज़ार कैसा लग रहा है। उन्होंने कहा: अच्छा लग रहा है। सामनेवाले ने पूछा: क्या लूं। उन्होंने कहा: जो अच्छा लगे, ले लो। सार यह कि कमाने के लिए हमें अपना सिस्टम बनाना होगा। अब हमारा इनपुट…औरऔर भी

ट्रेडर तो हर कोई बन सकता है क्योंकि जिसके पास भी पूंजी है वो शेयर बाज़ार में खरीदना-बेचना शुरू कर सकता है। लेकिन कामयाब ट्रेडर बनना बेहद कठिन है। संन्यासी जैसा निर्मोही और योद्धा जैसा निपुण। पुरानी सोच को घिस-घिसकर निकालना पड़ता है, अपने हथियार पर सान चढ़ानी पड़ती है। दरअसल, शेयर बाज़ार बना ही ऐसा है जहां मुठ्ठी भर जीतते हैं और खांची भर हारते हैं। जो दृष्टा है, वही जीतता है। अब आज का बाज़ार…औरऔर भी