इतने पर खरीदो, इतने पर बेचो और इतने पर स्टॉप-लॉस लगाओ! बाई-सेल, टार्गेट, स्टॉप-लॉस! क्या ट्रेडिंग के लिए इतना भर जान लेना पर्याप्त है? ज्यादातर लोगों का जवाब होगा हां, क्योंकि वे खुद यही करते हैं। इससे ज्यादा से उनका मतलब नहीं होता। हिंदी, मराठी या गुजराती भाषी लोगों को भी इतनी अंग्रेज़ी आती है तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि टिप अंग्रेज़ी में है या उनकी अपनी भाषा में। आंखों पर ऐसी पट्टी क्यों? अब आगे…औरऔर भी

मुनाफे का मौका ताड़ने में लोगों को ज्यादा वक्त नहीं लगता। हम हिंदुस्तानी इस मायने में खटाक से जोखिम उठाने को तैयार हो जाते हैं। पहले इंट्रा-डे ट्रेडिंग में लाखों ट्रेडरों ने हाथ जला डाला। अब हर कोई निफ्टी के ऑप्शंस व फ्यूचर्स से सम्मोहित है। सामान्य से सामान्य लोग जो बस गिनती-पहाड़ा तक जानते हैं, डेरिवेटिव जैसे जटिल प्रपत्रों में हाथ डाल रहे हैं। बस ऊपर-ऊपर जान लिया। बाकी रामनाम सत्य है। अब वार मंगल का…औरऔर भी

जब कोई घटना घट जाती है तो उसकी अनंत व्याख्याएं की जा सकती हैं। अपने-अपने हिसाब से तथ्य चुनो और बताते जाओ कि ऐसा इसलिए और वैसा उसलिए हुआ। लेकिन शेयरों के रोजमर्रा के भावों में धांधली जमकर होती है। इसे कोई भी नकार नहीं सकता। सूचकांकों पर नज़र रखिए। आप पाएंगे कि अक्सर ढाई बजे के बाद खटाक से बाज़ार की दिशा पलट दी जाती है। कल भी ऐसा ही हुआ। आखिर क्या थी इसकी वजह…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश और ट्रेडिंग में ज़मीन-आसमान का फर्क है। धैर्य व शांत चित्त दोनों में ज़रूरी है। लेकिन दोनों का टाइमफ्रेम भिन्न है। लंबे समय में कोई भी शांत और धैर्यवान हो सकता है। पर घंटे-दो घंटे या हफ्ते-दस दिन में भावनाओं के दबाव में आए बगैर ट्रेडिंग में ज्यादा कमाई और कम नुकसान के अवसर पकड़ना आसान नहीं। हंस मछली पकड़ लेता है, पर कौआ कांव-कांव करता रह जाता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सुरक्षित चलने वाला कभी बहुत ज्यादा नहीं कमाता। पर जितना कमाता है, बराबर कमाता है। वहीं जो खूब रिस्क लेता है वो कभी-कभी तो बहुत कमा लेता है। पर उसके हाथ में कटोरा आते भी देर नहीं लगती। कछुए व खरगोश की पुरानी कथा। अगर आपको ट्रेडिंग से बराबर कमाना है तो कम से कम रिस्क में ज्यादा से ज्यादा रिटर्न का सिस्टम बनाकर दृढ़ता से उसका पालन करना होगा। अब बुधवार के वार पर एक नज़र…औरऔर भी

इस दुनिया में कुछ भी अकारण नहीं, खासकर शेयर बाज़ार में तो कतई नहीं। सहज मानव स्वभाव के चलते हम जो होता है, उसकी वजह तलाशने में जुट जाते हैं। लेकिन सहजता ध्यान में चलती है, धंधे में नहीं। धंधे का वसूल है कुछ चीज़ों को नज़रअंदाज़ कर कुछ पर फोकस करना। कामयाब ट्रेडर को इससे मतलब नहीं कि शेयर इधर-उधर क्यों भागा। उसका फोकस है कि इस चाल से कमाया कैसे जाए। अब मंगलवार की चाल…औरऔर भी

बाज़ार में सन्निपात-सा छा गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति भले ही अच्छी न हो। लेकिन मात्र चालू खाता घाटा (सीएडी) घटने के आंकड़े ने बाज़ार को उठाने का बहाना दे दिया। मोदी के आने का हल्ला मचाकर गुब्बारे को फुलाया जा रहा है। लेकिन शेयर बाज़ार की हर हरकत के पीछे मंशा मुनाफा कमाने की होती है। बाज़ी हमेशा बड़े ट्रेडरों के हाथ में होती है। हम फंसे नहीं, इस सावधानी के साथ बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

समाज के आगे बढ़ने के साथ ज्ञान से लेकर समृद्धि तक का लोकतंत्रीकरण होता गया। यह किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि ज़रूरत के चलते हुआ। हालांकि अब भी विशेषाधिकार बचे हुए हैं। लेकिन अधिकारों और समृद्धि का विस्तार आज की जरूरत बन गया है। जो कंपनियां बढ़ना चाहती हैं, वे रिस्क पूंजी के लिए अवाम के बीच आती हैं। आम लोगो को भी इस निवेश का फायदा मिलता है। आज तथास्तु में पेश है एक संकोची कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में कामयाब लोगों की एक-एक हरकत सोची-समझी, जानी-बूझी होती है। यहां अनायास कुछ नहीं होता। हां, पूरी सृष्टि में अनिश्चितता है तो यहां भी कोई उसे मिटा नहीं सकता। लेकिन उसे साधने की पुरजोर कोशिश जरूर होती है। यहां दो तरह के लोग होते हैं। एक वे, जो जानते हैं कि क्या कर रहे हैं। दूसरे वे, जो सिर उठाकर रातोंरात अमीर बनने चले आते हैं। पहले बराबर कमाते हैं, जबकि दूसरे बराबर पिटते हैं।औरऔर भी

हम अक्सर जानकर नहीं, मानकर चलते हैं। जो जैसा है, उसे उस रूप नहीं, बल्कि जिस रूप में हम देखना चाहते हैं, वैसा देखते हैं। लग जाए, ऐसा होगा तो मान बैठते हैं कि वैसा ही होगा। ट्रेडिंग कोई आत्मपरक नहीं, बड़ी वस्तुपरक गतिविधि है। मन की पूर्वधारणा हमें सच नहीं देखने देती। नतीज़तन लड़ने से पहले ही हम हार जाते हैं। मनैव मनुष्यानाम् कारण बंधन मोक्षयो। गीता की यह सूक्ति ध्यान में रखकर बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी