ठीक उस वक्त जब हवा के रुख पर चलनेवाले बड़े-बड़े विद्वान अगले कुछ दिनों नहीं, कुछ महीनों की मंदी की भविष्यवाणी करने लगे थे, तभी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने भारत की संप्रभु रेटिंग एक पायदान उठाकर माहौल को खुशगवार बना दिया। अब एक बार फिर खरीद का सिलसिला चल निकलने की उम्मीद है। साथ ही उम्मीद है कि रिजर्व बैंक कल मंगलवार को मौद्रिक नीति समीक्षा में कुछ मंगल घोषणा कर सकता है। पर क्या होगा आज…औरऔर भी

बाज़ार है तभी मूल्य मिलता और दौलत बनती है। समृद्धि पैदा करने और उसका आधार फैलाने में बाज़ार का कोई दूसरा जोड़ीदार नहीं। जो लोग बाज़ार को गाली देते हैं वे असल में समाजवाद के नाम पर जाने-अनजाने सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। गांठ बांध लें कि भारत अभी जिस मुकाम पर है, वहां मोदी हों या न हों, अर्थव्यवस्था का जबरदस्त विकास होना है और बढेंगी अच्छी कंपनियां। इन्हीं की शिनाख्त करते हैं हम…औरऔर भी

बाज़ार में अमूमन तीन तरह की टिप्स चलती हैं। एक जो ट्रेंड की दिशा में चलाई जाती है। ऐसा सभ्य किस्म के ब्रोकरेज हाउस करते हैं। हालांकि अक्सर वे रिटेल को खरीदने तो संस्थाओं से बेचने को कहते हैं। दूसरी जो अंदरूनी खबर, एफआईआई या नामी निवेशकों की खरीद के नाम पर उड़ाई जाती है। तीसरी ऑपरेटर अपनी पकड़ वाले स्टॉक्स में चलाते हैं। इनमें सबसे खतरनाक यही तीसरी टिप्स होती है। इनसे बचें तो शुक्र मनाएं…औरऔर भी

हेड या टेल। 50-50% प्रायिकता। फिल्म शोले की तरह सिक्का सीधा खड़ा होगा, ऐसा हकीकत में अमूमन नहीं होता। शेयर बढ़ेगा या घटेगा या यथावत रहेगा। ज्यादा प्रायिकता के लिए ट्रेंड के साथ चलने का सूत्र अपनाया जाता है। लेकिन ट्रेंड तभी तक फ्रेंड है जब तक वो दिशा नहीं बदलता। दरअसल, कहां से ट्रेंड बदलेगा, उसी बिंदु को पकड़कर किए गए सौदे सबसे ज्यादा मुनाफा कराते हैं। इसे सीखना बड़ी चुनौती है। अब आज का बाज़ार…औरऔर भी

कोई भी सौदा तभी पूरा होता है जब खरीदने और बेचनेवाले, दोनों को लगता है कि वो उसके लिए फायदे का सौदा है। खरीदनेवाले को लगता है कि शेयर अभी और चढ़ेगा जिसके लिए जरूरी है कि उसके बाद भी दूसरे लोग उसे जमकर खरीदें। वहीं बेचनेवाले को लगता है कि निकल लो, अन्यथा यह और गिरेगा जिसके लिए चाहिए कि उसके बाद भी लोग उसे जमकर बेचें। समझिए यह परस्पर पूरक सच। चलाइए बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ज्यादातर रिटेल ट्रेडर इंट्रा-डे ट्रेडिंग करते हैं। इसमें सफलता के लिए ज़रूरी शर्त है कि आपके पास भरपूर पैसा, भरपूर समय और भरपूर अनुभव होना चाहिए। इनमें से रिटेल ट्रेडरों के पास एक ही चीज़ पर्याप्त होती है, वो है भरपूर समय। बाकी दो चीजों के अभाव में वो बराबर घाटा खाते रहते हैं। बहुत हुआ तो ठेले-खोंमचेवाले जैसी जिंदगी जीने लायक कमा लेते हैं। बड़ी अजीब त्रासदी है यह। चलिए, देखते हैं अब मंगलवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

व्यापारी बेचने के लिए जो माल लेता है, उससे उसे कोई निजी मोह नहीं होता। वो दुकान में वही माल लाता है जो चलता है। बेकार में दुकान की जगह भरता। इसी तरह शेयर बाज़ार के ट्रेडर को भी किसी स्टॉक से मोह नहीं पालना चाहिए। वही स्टॉक्स लें जिनमें लिक्विडिटी अच्छी हो। खरीदने और बेचनेवाले शेयरों की सूची अपडेट करते रहना चाहिए क्योंकि अपट्रेन्डिंग और डाउनट्रेन्डिंग स्टॉक बदलते रहते हैं। तो, पकड़ें अब सोम का सिरा…औरऔर भी

याद रखें कि शेयर बाज़ार अपने-आप में कुछ नहीं। वो अंततः अर्थव्यवस्था की छाया है। हमारी अर्थव्यवस्था अभी उस मुकाम है जहां से उसकी अनंत संभावनाएं खुलने जा रही हैं। मंथन चल रहा है। तलहटी में पड़े मुद्दे उभर कर सामने आ रहे हैं। पूरा देश समाधान खोजने में लगा है। विदेश गई प्रतिभाएं वापस आती जा रही हैं। अब भविष्य किसी सरकार का मोहताज नहीं। ऐसे में तथास्तु लगा है अच्छी कंपनियां चुनकर सामने लाने में…औरऔर भी

हम हिंदुस्तानी बड़े ही नहीं हो रहे। सोचते हैं कि कोई दूसरा हमारा कल्याण कर देगा। इस सोच में बंधे ट्रेडर व निवेशक शेयर बाज़ार तक में बस टिप्स खोजते हैं। इससे उन्हें तो कोई फायदा नहीं मिलता। हां, राजनेता, मंदिर, मुल्ला और टिप्सबाज़ ज़रूर ऐश करते हैं। लोगबाग यह समझने को तैयार नहीं कि उन्हें अपना भला खुद करना होगा। हमारी मदद बस 20% काम आएगी। बाकी 80% रंग लाएगी आपकी सतर्कता। अब शुक्र का चक्र…औरऔर भी

खबरों का एक अंतरराष्ट्रीय तंत्र है जो दुनिया भर के इक्विटी व बांड बाज़ारों में लहर उठाने के लिए कंकड़ फेंका करता है। अन्यथा 10-12 घंटे में ही फेडरल रिजर्व का मन कैसे बदल जाएगा? मंगलवार को कंकड़ फेंका कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक दो दिवसीय बैंठक में ब्याज दरें बढ़ानेवाला है। लेकिन बुधवार आते-आते बोल दिया कि उसका मन बदल गया है। इस तंत्र के इशारे पर नाचने के बजाय समझें बाज़ार संतुलन। अब गुरुवार का गुर…औरऔर भी